वाराणसी , जुलाई 6 -- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सिंधी समुदाय की साझा आनुवंशिक विरासत की पुष्टि हुई है। अध्ययन के अनुसार, भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से, बल्कि आनुवंशिक रूप से भी गहराई से जुड़े हुए हैं तथा उनकी साझा विरासत प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी है।
बीएचयू के ज्ञान लैब की वैज्ञानिक चंचल देवनानी, जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे तथा गुजरात विश्वविद्यालय के डॉ. खुशबू गौतम और प्रो. राकेश रावल ने 113 सिंधी व्यक्तियों के डीएनए का जीनोम-वाइड अध्ययन किया। शोध में लगभग 7.30 लाख डीएनए मार्करों का विश्लेषण कर उसकी तुलना विभिन्न समुदायों के करीब दो हजार व्यक्तियों के आनुवंशिक आंकड़ों से की गई। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, आधुनिक सिंधियों के डीएनए का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा प्राचीन सिंधु घाटी क्षेत्र की आबादी से जुड़ा है तथा यह आनुवंशिक मिश्रण लगभग 2500 से 2900 वर्ष पूर्व हुआ था। शोधकर्ताओं ने बताया कि सिंधी समुदाय एक विशिष्ट 'डायस्पोरा' का उदाहरण है, जो अपनी मूल भूमि से विस्थापित होने के बावजूद अपनी आनुवंशिक पहचान को काफी हद तक सुरक्षित रखने में सफल रहा है।
वर्ष 1947 के विभाजन के बाद बड़ी संख्या में सिंधी हिंदू और सिख भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सहित विभिन्न राज्यों में बस गए, लेकिन राज्यवार विश्लेषण में उनकी मूल आनुवंशिक संरचना लगभग समान पाई गई।
अध्ययन में भारत और पाकिस्तान के सिंधी समुदायों के बीच सबसे उल्लेखनीय अंतर सजातीय विवाह (इनब्रीडिंग) के स्तर पर पाया गया। शोध के अनुसार, पाकिस्तानी सिंधियों में एक जैसे डीएनए खंडों की संख्या और लंबाई अपेक्षाकृत अधिक मिली, जिसका प्रमुख कारण रिश्तेदारों में विवाह की परंपरा माना गया है। इसके विपरीत, भारतीय सिंधियों में विभाजन के बाद विभिन्न राज्यों में बसने और समुदाय के भीतर विविध वैवाहिक संबंध बनने के कारण आनुवंशिक विविधता अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।
प्रमुख जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि सिंधी समुदाय भी यहूदियों की तरह एक प्रमुख डायस्पोरा है। विभाजन के कारण यह समुदाय विभिन्न देशों और क्षेत्रों में बंट गया, लेकिन उसका डीएनए आज भी सिंधु घाटी की प्राचीन विरासत से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन दर्शाता है कि भौगोलिक दूरी और ऐतिहासिक परिस्थितियों के बावजूद सिंधी समुदाय की साझा आनुवंशिक पहचान आज भी सुरक्षित है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, सिंधी समुदाय की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण पारंपरिक 'अज्रक' वस्त्र में भी दिखाई देता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त पुरावशेषों में अंकित त्रिफोली पैटर्न और आज प्रचलित अज्रक की डिजाइन में समानता इस सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता को रेखांकित करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन प्राचीन इतिहास, आनुवंशिकी और सांस्कृतिक विरासत के बीच गहरे संबंधों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
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