आरा , अप्रैल 23 -- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अजेय योद्धा वीर कुंवर सिंह की बहादुरी ने अंग्रेजी सल्तनत की नींव हिला दी थी। वीर कुंवर सिंह भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्होंने आजाद मातृभूमि पर शहीद होने का गौरव प्राप्त किया। उम्र के अंतिम पड़ाव (80 वर्ष की आयु) में जिस वीरता और सांगठनिक क्षमता के साथ उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विप्लव का डंका बजाया, वैसा उदाहरण विश्व के इतिहास में दुर्लभ है।

टी.आर. होम्स ने लिखा है "एक ऐसा व्यक्ति बिहार में था, जो आयु में लाॅयड से भी वृद्ध था, लेकिन अपनी युवावस्था के उमंग से भरा था और अंग्रेजों को परास्त करने के लिए संकल्पित था। वह था युद्ध कौशल राजपूत बाबू कुंवर सिंह।"वीर कुंवर सिंह का जन्म बिहार के जगदीशपुर में जमींदार परिवार में हुआ था। छोटी रियासत के बावजूद उनकी उदारता एवं दानशीलता के किस्से आज भी क्षेत्र में बड़े चाव से लोग एक दूसरे को सुनाते हैं।

इतिहासकार गिरधारी अग्रवाल ने लिखा है "सन 1857 की क्रांति में 80 वर्षीय योद्धा ने अपने युद्ध कौशल एवं पराक्रम से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। इस युद्धवीर ने 25 जुलाई 1857 से 23 अप्रैल 1858 तक के इस नौ माह के युद्ध में 15 भयानक लड़ाइयां लड़ीं और यूनियन जैक का झंडा उतरवाकर देश का झंडा लहराया।"विभिन्न समुदाय के लोगों को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध जिस रणनीति और अदम्य साहस के साथ उन्होंने अनेक युद्ध किए, वह अपने आप में एक उदाहरण है। उन्हें गुरिल्ला युद्ध में महारथ हासिल थी। वीर कुंवर सिंह जिस दौर में अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूंके थे, उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाले लोग और हरवे-हथियार की संख्या बहुत कम थीं। बावजूद अपनी अद्भुत सांगठनिक क्षमता और सर्व धर्म समभाव के कारण हिंदू, मुस्लिम, दलित एवं पिछड़ी जाति के लोगों की एक बड़ी जमात तैयार कर अंग्रेजो का मुकाबला किया। सभी धर्मों के लोग इनकी सेना में शामिल हुए। अली करीम, वारिस अली, इब्राहिम खाॅ, (गाजीपुर यूपी) बाबू कुंवर सिंह के सैन्य पदाधिकारी एवं निजी सेवक थे, जबकि किफायत हुसैन, द्वारिका माली, रणजीत ग्वाला, देवी ओझा एवं शंकर मिश्र आम जनता के प्रतिनिधि थे। उनके पंच में दलित समुदाय के लोग रखे गए थे।

आरा में अंग्रेजों से विजय के बाद बाबू कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल 1957 को शासन स्थापित कर मो. याहिया खाॅ को प्रथम मजिस्ट्रेट बनाकर झंड़ोतोल्लन कराया। उसी परम्परा में प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव दिवस मनाया जाता है।

मिल्की मोहल्ला के शेख मो.अजीमुद्दीन को पूर्वी थाने का जमादार तथा तुराव अली एवं खादिम अली को कोतवाल बनाया। बाबू साहब रण कौशल में पारंगत होने के साथ सामाजिक सद्भाव और दानशीलता के प्रतीक थे। उन्होंने मंदिर, मस्जिद, कला केन्द्र, स्कूल एवं बांध के निर्माण सहित शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर जिस उदारता का परिचय दिया, अपने आप में एक मिसाल है। यानी वर्तमान में जिन मुद्दों पर सहमति और असहमति के बीच की दूरी कम होती नहीं दिख रही, उसे बाबू कुंवर सिंह ने सर्वग्राह्य बना दिया था।

अंग्रेज लेखक जो आरा स्टेशन पर सहायक सर्जन था, ने लिखा है "संघर्ष के क्रम में कुछ यूरोपियन तथा कुछ अंग्रेज परिवार कुंवर सिंह के अधिकार में चले गए थे, लेकिन उनके साथ बाबू साहब ने मानवीय व्यवहार किया।" पीजीओ टेलर ने भी लिखा है "आरा में किसी अंग्रेज या उनके समर्थकों की हत्या निरुदेश्य नहीं की गई। अपने लोगों के मध्य बाबू कुंवर सिंह कितने लोकप्रिय थे, इसका उदाहरण 21 अप्रैल 1858 को उनके गंगा पार करने के अवसर पर भी दिखा था। आजमगढ़ जिले के मजिस्ट्रेट आर. डेविस जो शिवपुर गंगा नदी घाट (बलिया, यूपी) पर ब्रिटिश सेना के साथ कैंप कर रहा था, ने लिखा है "मजिस्ट्रेट के कड़े निर्देश के बाद सारी नावें गंगा नदी से हटा ली गई थीं। बावजूद बाबू कुंवर सिंह की सेना को पार कराने के लिए अचानक गंगा में नावें लहरानें लगीं।" इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों के विरूद्ध बाबू कुंवर सिंह ने जितनी लंबी दूरी तय कर आक्रामक (ओफेंसिव) लड़ाइयां लड़ी उतनी लड़ाइयां किसी ने नहीं लड़ी। आरा से भाया सासाराम आजमगढ़ और काल्पी तक का युद्ध उन्होंने स्थानीय लोगों के सहयोग से लड़ी।

बाबू साहब की वीरता को लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल में आज भी वीर रस से ओतप्रोत अनेक परम्परागत गीत गाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में एक फगुआ गीत खूब प्रचलित है "बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर। बंगला में उड़ेला अबीर आरे लाल बंगला में उड़ेला अबीर.....।" भोजपुरी क्षेत्र में व्यवस्था परिवर्तन का आग्रह गीत "अट्ठारह सौ सत्तावन के फिर से बिगुल बजाव, ए दादा, फिर एक बार तू आव।" अक्सर सार्वजनिक समारोहों में गूंज जाता है।

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