चंडीगढ़ , सितंबर 30 -- पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव और अमृतसर के पूर्व जिला निर्वाचन अधिकारी केबीएस सिद्धू ने 'अकाली दल (वारिस पंजाब दे)' के राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के आवेदन पर निर्वाचन आयोग की ओर से जतायी गयी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर सवाल उठाये हैं।

उन्होंने कहा कि आयोग की ओर से लंबे समय तक आवेदन लंबित रखने और अब राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देने से उसकी कार्यप्रणाली और स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होते हैं। यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में भी पहुंच चुका है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने अदालत को बताया है कि संगठन के पंजीकरण को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कुछ चिंताएं हैं। अदालतने आयोग से एक अक्टूबर तक यह बताने को कहा है कि वह आवेदन पर कब तक निर्णय लेगा।

श्री सिद्धू ने अपने बयान में कहा कि किसी राजनीतिक संगठन की नीतियों से सहमति या असहमति अलग विषय है, लेकिन पंजीकरण का अधिकार कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि नये राजनीतिक दल को अपने संविधान में भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा तथा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता बनाये रखने की प्रतिबद्धता दर्ज करनी होती है।

उन्होंने दावा किया कि 'वारिस पंजाब दे' के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने 2024 में खडूर साहिब लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करते समय और बाद में लोकसभा में शपथ लेते समय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी तथा संगठन के संविधान में भी ऐसी प्रतिबद्धता दर्ज है। पंजीकरण के लिए हालांकि संगठन की ओर से दाखिल दस्तावेजों और आयोग की आपत्तियों पर अंतिम कानूनी स्थिति अदालत के निर्णय के बाद स्पष्ट होगी।

श्री सिद्धू के अनुसार, संगठन ने जनवरी 2025 में पंजीकरण के लिए आवेदन किया था और लंबे समय तक निर्णय नहीं होने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, 'अकाली दल वारिस पंजाब दे' के प्रस्तावित नाम से संबंधित याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है। उन्होंने कहा कि पंजीकरण का चुनावी महत्व भी है, क्योंकि इससे राजनीतिक दल को साझा चुनाव चिह्न, चुनावी खर्च और वित्तीय नियमों से संबंधित निर्धारित कानूनी सुविधाएं मिल सकती हैं। आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर संगठन पहले ही राजनीतिक गतिविधियां बढ़ा चुका है, हालांकि उसे अभी निर्वाचन आयोग से औपचारिक पंजीकरण और चुनाव चिह्न नहीं मिला है।

श्री सिद्धू ने यह भी कहा कि यदि किसी संगठन को राज्य की ओर से वास्तविक सुरक्षा खतरा माना जाता है, तो कानून में उसके खिलाफ अलग कानूनी कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि केवल राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी अस्पष्ट आशंका के आधार पर पंजीकरण को लंबे समय तक लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने निर्वाचन आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठ रहे सवालों का भी उल्लेख किया तथा कहा कि ऐसे समय में आयोग से निष्पक्षता और पारदर्शिता की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत में रखी गयी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं का विस्तृत आधार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसलिए इस मामले में अंतिम स्थिति आयोग के निर्णय और दिल्ली उच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही के बाद ही स्पष्ट होगी।

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