वाराणसी , मई 13 -- ज्योतिषपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि जैसे रामायण काल में रावण ने राक्षसों को हिंदू वेशभूषा में भेजकर राम की सेना को भ्रमित करने का प्रयास किया था, उसी प्रकार आज "छद्म हिंदुत्व" के माध्यम से समाज को भ्रमित किया जा रहा है। 'गविष्टि (गौरक्षार्थ धर्मयुद्ध)' अभियान के तहत बुधवार को वाराणसी जिले की छह विधानसभाओं में आयोजित जनसभाओं को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने गौ रक्षा का आह्वान किया। इस दौरान उपस्थित लोगों ने वैदिक मंत्र "अहं हन्मि वृत्रं गविष्टौ" का सामूहिक उच्चारण कर गौ रक्षा का संकल्प लिया।
"कालनेमि को पहचानो" विषय पर प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन आक्रमणों और वर्तमान परिस्थितियों में बड़ा अंतर है। पहले शत्रु की पहचान स्पष्ट होती थी, इसलिए उसका मुकाबला करना आसान था, लेकिन आज शत्रु ने धर्म और संस्कृति का ही स्वरूप धारण कर लिया है।
उन्होंने कहा कि माथे पर तिलक, गले में गेरुआ और मुख पर "जय श्रीराम" का नारा लगाने मात्र से कोई वास्तविक हिंदू नहीं हो जाता। हिंदू होने के लिए बाहरी वेशभूषा नहीं, बल्कि हृदय में धर्मभाव आवश्यक है।
शंकराचार्य ने रामायण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब रावण को अपनी पराजय का आभास हुआ तो उसने राक्षसों को तिलक लगाकर और "जय श्रीराम" के नारे लगाते हुए राम की सेना में घुसने का आदेश दिया, जिससे सेना भ्रमित हो गई थी। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने तब स्पष्ट किया था कि केवल रूप धारण कर लेने से कोई धर्मात्मा नहीं बन जाता।
शंकराचार्य ने कालनेमि प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे हनुमान जी ने साधु वेश में छिपे कालनेमि की पहचान कर उसे परास्त किया था, उसी प्रकार आज समाज को भी धार्मिक स्वरूप में छिपे "राजनीतिक कालनेमियों" को पहचानना होगा। उन्होंने असम के मुख्यमंत्री के एक बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म और राजनीति के नाम पर दोहरे आचरण से समाज को सावधान रहने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रतीकों का उपयोग केवल दिखावे या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं होना चाहिए।
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