शिमला , फरवरी 28 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि पदोन्नति और पेंशन संबंधी लाभ प्रदान करने वाले न्यायिक फैसले को कानून में पूर्वव्यापी संशोधन के जरिये निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन वह किसी सक्षम न्यायालय के अंतिम निर्णय को नया कानून बनाकर अप्रभावी या निरस्त नहीं कर सकता।

यह टिप्पणी 'अश्विनी कुमार बनाम राज्य हिमाचल प्रदेश एवं अन्य' मामले में 27 फरवरी को न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने की।

याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा तब खटखटाया जब राज्य सरकार ने "हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम, 2024" का हवाला देते हुए पूर्व में दिये गये लाभ वापस लेने की कार्रवाई शुरू की। ये लाभ उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में दिये गये थे और राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के बाद आदेश अंतिम रूप ले चुके थे। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलीलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सक्षम न्यायालय के अंतिम निर्णय के अनुपालन में दिये गये लाभों को वापस लेना जायज़ नहीं है।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यद्यपि राज्य को पूर्वव्यापी प्रभाव से कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन वह किसी न्यायिक निर्णय को अप्रभावी नहीं कर सकता। आदेश में कहा गया, " राज्य को यह अधिकार है कि वह पूर्वव्यापी तिथि से कानून बनाकर यह घोषित करे कि किसी विशेष तिथि पर क्या विधि मानी जाएगी, लेकिन उसे किसी सक्षम न्यायालय द्वारा कानून के अनुसार दिये गये निर्णय को निष्प्रभावी करने या उसे पलटने का अधिकार नहीं है।"न्यायालय ने इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के निर्णय 'जनपद सभा छिंदवाड़ा बनाम सेंट्रल प्रोविंसेज सिंडिकेट लिमिटेड (1970) 1 एससीसी 509' का हवाला दिया।

याचिकाकर्ता के तर्कों में बल पाते हुए उच्च न्यायालय ने प्रथमदृष्टया मामला बनता पाया और अंतरिम राहत प्रदान की। न्यायालय ने 17 जनवरी, 2026 को हिमाचल प्रदेश के कोषागार, लेखा एवं लॉटरी निदेशक द्वारा जारी कार्यालय आदेश के क्रियान्वयन और अनुपालन पर याचिका लंबित रहने तक रोक लगादी है। यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब राज्य सरकार ने 2024 के अधिनियम को पूर्वव्यापी रूप से लागू कर न्यायिक आदेशों के तहत दिये गये लाभों को वापस लेने का प्रयास किया था।

अदालत की टिप्पणियां संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को रेखांकित करती हैं, जिसके तहत विधानमंडल कानून बना या संशोधित कर सकता है, लेकिन अंतिम न्यायिक निर्णय को केवल उसे निष्फल करने के उद्देश्य से बनाये गये कानून द्वारा सीधे निरस्त नहीं कर सकता।

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने 2024 के शीतकालीन सत्र (तपोवन) में यह कानून पारित किया था, जिसमें पदोन्नति और पेंशन से संबंधित न्यायालयीन निर्णयों के प्रभाव को समाप्त करने का प्रावधान किया गया था। याचिकाकर्ता ने अब 2024 के अधिनियम के प्रावधानों को भी चुनौती दी है।

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