हमीरपुर , जून 11 -- उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी (एचआरपी) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण, समय पर जांच और चिकित्सकीय परामर्श के अभाव में उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की संख्या बढ़ रही है, जिसका असर नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी देखने को मिल रहा है।
जिला महिला अस्पताल के मुख्य चिकित्साधीक्षक (सीएमएस) डॉ. के. एस. मिश्रा ने गुरुवार को बताया कि जिले में प्रतिवर्ष लगभग 30 हजार प्रसव विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों में कराए जाते हैं। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच के दौरान एचआईवी, एनीमिया और अन्य आवश्यक परीक्षण किए जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित पाई जाती हैं।
उन्होंने बताया कि गंभीर एनीमिया से ग्रसित गर्भवती महिलाओं को हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे मामलों में मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। चिकित्सकों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के कारण समय से पूर्व प्रसव, कम वजन के शिशु का जन्म तथा नवजातों में विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि जिले में दो हजार से अधिक बच्चे अति कुपोषण की श्रेणी में चिन्हित हैं। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल और पोषण की कमी को भी कुपोषण की समस्या से जोड़कर देखा जाता है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को हाई रिस्क श्रेणी में आने से रोकने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत पौष्टिक आहार और आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां उपलब्ध कराने का प्रावधान है। साथ ही, नियमित प्रसवपूर्व जांच (एएनसी) के माध्यम से जोखिम वाले मामलों की समय रहते पहचान करने का प्रयास किया जाता है।
टेक्निकल सपोर्ट यूनिट के प्रभारी अमित शर्मा ने बताया कि गर्भवती महिलाओं को जागरूक करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल स्वास्थ्य विभाग के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि परिवार और स्वयं महिलाओं को भी नियमित जांच, संतुलित आहार और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना चाहिए।
जिला कार्यक्रम अधिकारी इंद्रपाल सिंह ने बताया कि कुपोषण की स्थिति पर नजर रखने के लिए नियमित सर्वेक्षण कराए जाते हैं और शासन को रिपोर्ट भेजी जाती है। वहीं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के जिला कार्यक्रम प्रबंधक आर. के. साहू ने कहा कि आशा कार्यकर्ताओं को समय-समय पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं ताकि गर्भवती महिलाओं का समय पर पंजीकरण और स्वास्थ्य परीक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के मामलों में कमी लाने के लिए गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण से ही नियमित चिकित्सकीय देखरेख, संतुलित एवं पौष्टिक आहार, आयरन एवं फोलिक एसिड का सेवन तथा संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुंच अत्यंत आवश्यक है।
जिले में बढ़ते एचआरपी मामलों के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों से नियमित जांच कराने तथा किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लेने की अपील की है।
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