नैनीताल , सितंबर 01 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 18 जून 2005 से पहले सेवानिवृत्त हुए शिक्षकों के ग्रेच्युटी के मामले में मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने पंतनगर विश्वविद्यालय सेवा निवृत्त शिक्षक कल्याण समिति की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के 27 सितंबर 2022 के शासनादेश और विश्वविद्यालय की ओर से जारी 31 अक्टूबर 2022 के आदेश को निरस्त कर दिया है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि समिति के पात्र सदस्यों को ग्रेच्युटी का भुगतान छह प्रतिशत ब्याज के साथ किया जाए। अदालत ने यह भुगतान वर्ष 2017 में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले और 18 नवंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उस फैसले को बरकरार रखे जाने के अनुरूप करने के निर्देश दिए हैं।
दरअसल, पंतनगर विश्वविद्यालय सेवा निवृत्त शिक्षक कल्याण समिति की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि समिति में 63 पेंशनर्स, 19 फैमिली पेंशनर्स और तीन कानूनी वारिस शामिल हैं। ये सभी 18 जून 2005 से पहले विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए थे। इनमें कई शिक्षकों ने 60 वर्ष की आयु तक सेवा में रहने का विकल्प चुना था, जिसके आधार पर उन्हें ग्रेच्युटी का लाभ नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इसी तरह के मामले में हाईकोर्ट ने 01 नवंबर 2017 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। विश्वविद्यालय की ओर से इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 18 नवंबर 2021 को विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि किसी कर्मचारी द्वारा सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष किए जाने का विकल्प चुनना अपने आप में उसे ग्रेच्युटी के अधिकार से वंचित नहीं करता। विश्वविद्यालय ने भुगतान उपदान अधिनियम, 1972 की धारा 5 के तहत कोई वैध छूट प्राप्त नहीं की थी।
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