महराजगंज , जुलाई 10 -- उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में नेपाल से निकलकर नौतनवा तहसील क्षेत्र से गुजरने वाला महाव नाला हर वर्ष बाढ़ और तबाही की इबारत लिख रहा है। क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि तटबंधों की मरम्मत और सिल्ट सफाई के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन हल्का जल दबाव भी तटबंध नहीं झेल पाते और टूट जाते हैं। नतीजतन किसानों की फसलें बर्बाद होती हैं और प्रभावित गांवों के लोग हर साल नुकसान झेलने को मजबूर होते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार महाव नाले का तटबंध पिछले एक दशक में कई बार टूट चुका है। वर्ष 2013 में कनरी, बरवा और खैरहवा दुबे के पास तटबंध टूटा था। इसके बाद वर्ष 2014 में खैरहवा दुबे, बरगदवा, बिशनपुरा, नारायनपुर, कोहरगड्डी और अमहवा क्षेत्र में कई स्थानों पर तटबंध टूटने की घटनाएं हुईं। वर्ष 2015 और 2016 में भी दोगहरा, खैरहवा दुबे, नारायनपुर और अन्य गांवों के समीप तटबंध टूटने से व्यापक नुकसान हुआ। हाल के वर्षों 2023, 2024, 2025 और 2026 में भी तटबंध टूटने की घटनाओं ने क्षेत्र में तबाही मचाई है।

नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाला महाव नाला कनरी चकरार गांव के पास भारतीय सीमा में प्रवेश करता है। इसके बाद यह बरगदवा और परसा मलिक थाना क्षेत्र से होते हुए सोहगी बरवा वन्यजीव प्रभाग के जंगल में बहने वाली प्यास नदी में मिल जाता है। जंगल क्षेत्र में नदी का तल संकरा और बहाव टेढ़ा-मेढ़ा होने के कारण बाढ़ के समय पानी का अत्यधिक दबाव तटबंधों पर पड़ता है, जिससे कमजोर हिस्से टूट जाते हैं और बाढ़ का पानी खेतों और गांवों में पहुंचकर भारी नुकसान पहुंचाता है।

पीड़ित किसानों का कहना है कि तटबंध टूटने के बाद अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचकर मरम्मत और स्थायी समाधान का आश्वासन देते हैं, लेकिन समस्या का दीर्घकालिक समाधान आज तक नहीं हो सका है। प्रशासन की ओर से राहत सामग्री वितरण और मरम्मत कार्यों के दावे किए जाते हैं, मगर बाढ़ से स्थायी राहत के लिए कोई प्रभावी योजना धरातल पर दिखाई नहीं देती।

ग्रामीणों का आरोप है कि सिल्ट सफाई का कार्य भी समय पर नहीं कराया जाता। अक्सर बरसात शुरू होने के बाद पोकलैंड मशीनों से सफाई का काम शुरू किया जाता है, जिससे अधूरे कार्यों के बीच ही बाढ़ आ जाती है और पूरा खर्च निष्प्रभावी साबित होता है। उनका कहना है कि समय रहते वैज्ञानिक ढंग से सफाई और तटबंधों को मजबूत किया जाए तो काफी हद तक राहत मिल सकती है।

सिंचाई विभाग के अभिलेखों में महाव को नाला दर्ज किया गया है, जबकि स्थानीय किसान इसे एक खतरनाक पहाड़ी नदी मानते हैं। भारतीय क्षेत्र में इसकी कुल लंबाई लगभग 23 किलोमीटर है, जिसमें करीब आठ किलोमीटर हिस्सा जंगल से होकर गुजरता है। महाव नाले में 65 से अधिक खतरनाक मोड़ बताए जाते हैं।

महाव के पूर्वी तटबंध के टूटने से बरगदवा, देवघट्टी, हरखपुरा, शिकारगढ़, नारायनपुर, हरपुर, अमहवा, बेलहिया, खजहिया और गनेशपुर समेत कई गांव प्रभावित होते हैं। वहीं पश्चिमी तटबंध टूटने पर खैरहवा दुबे, कोहरगड्डी, असुरैना, दोगहरा, विशुनपुरा, जहरी, सागरहवा, महरी, घोड़हवा, लुठहवा और गंगवालिया सहित अनेक गांवों में बाढ़ का पानी तबाही मचा देता है।

सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता राजीव कपिल ने बताया कि हाल में टूटे तटबंध की मरम्मत तत्काल करा दी गई है और जिम्मेदार अधिकारियों को निरंतर निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।

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