रोहतक , जुलाई 31 -- हरियाणा में सरकारी अस्पतालों में उपचार कराना भी आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है।

अखिल भारतीय अस्पताल प्रशासक संघ के कार्यकारी सदस्य डॉ. नरेश पुरोहित ने दावा किया कि सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीज को औसतन 10 हजार रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ते हैं, जो राष्ट्रीय औसत 6,631 रुपये से करीब 66 प्रतिशत अधिक है।

रोहतक स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में शुक्रवार को आयोजित एक सेमिनार के दौरान 'सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती दर एवं घटता स्तर' विषय पर अपनी शोध रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए डॉ. पुरोहित ने यह जानकारी दी। उन्होंने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि हरियाणा में सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने पर मरीजों का खर्च राष्ट्रीय औसत से करीब 4,356 रुपये अधिक बैठ रहा है। उन्होंने बताया कि निजी अस्पतालों में इलाज का औसत खर्च हरियाणा में 42,359 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से कम है, लेकिन यह राशि भी आम परिवारों के लिए काफी अधिक है।

डॉ. पुरोहित ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयों, जांचों और अन्य सहायक सेवाओं पर होने वाला अतिरिक्त खर्च मरीजों की आर्थिक परेशानी बढ़ा रहा है। कई आवश्यक सुविधाएं अस्पतालों में उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को बाहर से सेवाएं लेनी पड़ती हैं, जिससे इलाज का कुल खर्च बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि हरियाणा में चैरिटेबल अस्पतालों में प्रति मरीज औसत चिकित्सा खर्च 16,948 रुपये है, जबकि राष्ट्रीय औसत 39,550 रुपये है। वहीं अस्पताल में भर्ती होने पर हरियाणा में औसत चिकित्सा खर्च 33,713 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत 34,064 रुपये से थोड़ा कम है। पंजाब में यह औसत 35,703 रुपये दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिना भर्ती वाले इलाज (आउटडोर उपचार) में भी हरियाणा राष्ट्रीय औसत से महंगा है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति इलाज औसत खर्च 1,361 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 1,464 रुपये है, जबकि राष्ट्रीय औसत क्रमशः 847 रुपये और 884 रुपये है। हरियाणा में यह खर्च राष्ट्रीय औसत से लगभग 63 प्रतिशत अधिक है। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में औसत खर्च 1,283 रुपये तथा शहरी क्षेत्रों में 1,158 रुपये है।

डॉ. पुरोहित ने कहा कि इलाज का खर्च केवल दवाइयों और अस्पताल शुल्क तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने-जाने और भोजन जैसे अतिरिक्त खर्च भी मरीजों और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ाते हैं। उन्होंने सरकार से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक किफायती बनाने तथा मरीजों की जेब से होने वाले खर्च को कम करने के लिए प्रभावी नीतियां लागू करने की मांग की।

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