देहरादून , मई 16 -- भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (एमओसी) की मुख्य पहल "ज्ञानभारतम् मिशन" के अंतर्गत, उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन में आयोजित पांच दिवसीय 'पांडुलिपियों का निवारण तथा संरक्षण' विषयक कार्यशाला का शनिवार को समारोह पूर्वक समापन हुआ।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि आयुर्वेद के वर्तमान में शिरोमणि कहे जा रहे आचार्य बालकृष्ण ने 'देश की मूल संस्कृति तथा मूल प्रकृति' को समझने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जीर्ण-क्षीर्ण पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का उद्देश्य हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। उन्होंने रेखांकित किया कि केवल संरक्षण ही नहीं, बल्कि प्राचीन पांडुलिपियों के साथ-साथ नए लेखन कार्य को भी बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने आह्वान किया कि 400-500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियों को संशोधित एवं पुनर्संरक्षित करके उन्हें नए स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए, ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बन सकें।

आचार्य बालकृष्ण ने इसके साथ ही, 'साक्ष्य-आधारित दस्तावेजों' और प्रमाणों के संरक्षण पर जोर दिया। जिसमें शास्त्रीय ग्रंथ, दस्तावेज, 'बाबरनामा' और 'आईने अकबरी' जैसे ऐतिहासिक स्रोतों का संदर्भ लेकर इतिहास की गहन समझ विकसित करने की बात कही। उन्होंने पतंजलि के प्रयासों का उल्लेख करते हुए 'साक्ष्य-आधारित इतिहास लेखन' की दिशा में किए जा रहे कार्यों को साझा किया। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियाँ केवल पुरातन दस्तावेज नहीं हैं, अपितु वह हमारी संपदा, संस्कृति व ज्ञान का अमूल्य भंडार हैं, जिन्हें संरक्षित करना आवश्यक है।

उन्होंने चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और धन्वंतरि जैसे प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए पांडुलिपियों के अध्ययन से इतिहास के छिपे हुए रहस्यों को समाज के लिए समझाने की बात कही। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को संस्कृति-संरक्षण के मूल आधारों से सहसंबद्ध बताया और संस्कृति मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की।

इस अवसर पर वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों ने पतंजलि 'कृषि अनुसंधान परिसर' का अवलोकन किया। कृषि मृदा अनुसंधान की वैज्ञानिक डॉ. मनोहारी राठी ने प्रतिनिधियों को भारत में पाई जाने वाली आठ प्रमुख प्रकार की मिट्टियों, मृदा परीक्षण की प्रक्रियाओं तथा पतंजलि द्वारा विकसित 'धरती का डॉक्टर' ऑटोमेटेड मृदा परीक्षण मशीन के बारे में जानकारी दी। साथ ही, उन्होंने एटोमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री, यूवी-विज़ स्पेक्ट्रोफोटोमीटर एवं फ्लेम फोटोमीटर सहित विभिन्न आधुनिक उपकरणों की कार्यप्रणाली की जानकारी दी। जीबीएम, नई दिल्ली की वरिष्ठ संरक्षक अर्चना गहलोत ने अपने दीर्घकालीन प्रयोगात्मक सत्र में पांडुलिपियों के अवलोकन से संबंधित विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी।

पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन की विभागाध्यक्ष डॉ. वेदप्रिया आर्या ने सभी का आभार व्यक्त किया। इसके बाद 'पतंजलि योग यात्रा' पर आधारित एक प्रेरणादायक डॉक्युमेंट्री का प्रदर्शन किया गया।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित