देहरादून, दिसंबर 13 -- उत्तराखंड में देहरादून के दून अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को दुरुस्त किए जाने की मांग को लेकर राज्य आंदोलनकारियों ने शनिवार को अस्पताल के ओपीडी भवन के सामने जमकर प्रदर्शन करते हुए अपना आक्रोश जताया है। अपनी मांगों को लेकर उन्होंने जिला प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा है।

उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच से जुड़े आंदोलकारियों ने प्रदेश की अस्थाई राजधानी में लगातार बिगड़ती जा रही स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर अपनी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि राज्य गठन के 25 वर्षों बाद भी प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था दुरस्त नहीं हो पाई है।

स्वास्थ्य मंत्री लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को बहाल करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं। पहाड़ों के अस्पतालों की स्थिति तो इससे भी ज्यादा बेहतर है, जिस कारण वहां की जनता अब सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर है।

पहाड़ों के अस्पताल मात्र रेफर केंद्र बनकर रह गए हैं। ऐसी बदहाल स्थिति देहरादून के दून अस्पताल की भी है, जब दून मेडिकल कॉलेज केवल जिला अस्पताल था तब यहां लगभग सारी सुविधाएं उपलब्ध हुआ करती थी और सभी डॉक्टरों की मौजूदगी बनी रहा करती थी। लेकिन दून मेडिकल कॉलेज मे परिवर्तित किए जाने के बाद से यहां की व्यवस्थाएं पूरी तरह से लड़खड़ा गई है।

मंच के जिला अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती ने कहा कि मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में कभी एक्स-रे मशीन, सीटी स्कैन मशीन, कभी अल्ट्रासाउंड और एमआरआई मशीन या तो अधिकतर समय खराब रहती हैं या उनके टेक्नीशियन उपलब्ध नहीं रहते हैं।

यही हाल वार्डों, शौचालयों का है, जहां साफ सफाई की व्यवस्था के बुरे हाल हैं। ओपीडी और इमरजेंसी के हालात उससे भी बुरे हैं। वहां रोगी और तीमारदार परेशान होकर इधर-उधर भटकने के लिए मजबूर हैं।

कई बार ओपीडी और इमरजेंसी में अराजकता का माहौल बन जाता है जिससे मरीजों और डॉक्टरों में आपसी विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अस्पताल प्रशासन ने वार्डों की कमियों को अभी तक दूर नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि दून मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य व सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है। अस्थाई कर्मचारियों के भरोसे चल रहे अस्पताल की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है।

राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि अस्पताल के ज्यादातर डॉक्टर्स बाहर की दवाइयों को प्रिसक्राइब कर रहे हैं। जिससे गरीब तबके के मरीजों के ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है, उन्हें बाजार के प्राइवेट मेडिकल स्टोरों से महंगी दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

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