चेन्नई , अप्रैल 29 -- भारतीय राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर आयोग (एनसीएएचपी) की अध्यक्ष डॉ. यज्ञ उन्मेश शुक्ला ने बुधवार को कहा कि एनसीएएचपी का 'एक राष्ट्र, एक पाठ्यक्रम' का जनादेश संबद्ध स्वास्थ्य देखभाल शिक्षा में एक नया मानक स्थापित करेगा।

'ऑटिज्म देखभाल का बदलता स्वरूप : आधुनिक तकनीक और संवेदनशील चिकित्सा का संगम" विषय पर केंद्रित 'नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन ऑटिज्म 2026' का वर्चुअल उद्घाटन करते हुए डॉ शुक्ला ने कहा कि मानवीय स्पर्श, सहानुभूति और आपसी रिश्तों के बिना तकनीक आदर्श नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि ऑटिज्म देखभाल में नवाचार को एक पूरक के रूप में एकीकृत किया जाना चाहिए, न कि विकल्प के रूप में।

डॉ. यज्ञ ने कहा, "ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों को केवल निदान की नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और एक ऐसे संसार की आवश्यकता है, जो उन्हें उसी रूप में स्वीकार करे जैसे वे हैं।" उन्होंने जोर दिया कि 'एक राष्ट्र, एक पाठ्यक्रम' के तहत एनसीएएचपी की अधिसूचित 17 पाठ्यक्रमों का कार्यान्वयन संबद्ध स्वास्थ्य देखभाल शिक्षा में उत्कृष्टता का नया बेंचमार्क स्थापित करेगा। शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से लागू होने वाली यह व्यवस्था देश भर में ऑक्यूपेशनल थेरेपी और फिजियोथेरेपी सहित अन्य क्षेत्रों में समान मानक और मजबूत पेशेवर दक्षता सुनिश्चित करेगी।

कट्टनकुलथुर स्थित एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (एसआरएमआईएसटी) के 'एसआरएम कॉलेज ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी' आयोजित इस सम्मेलन में नैदानिक विशेषज्ञता और तकनीकी हस्तक्षेप के समन्वय की बढ़ती आवश्यकता पर जोर दिया। इसमें देश भर के शिक्षाविदों और स्वास्थ्य पेशेवरों की एक शृंखला जुटी, जिसने ऑटिज्म देखभाल में संवाद और ज्ञान साझा करने के लिए साझा मंच प्रदान किया।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिद्धा के डीन प्रोफेसर डॉ. एम. मीनाक्षी सुंदरम ने 'न्यूरोडेवलपमेंटल' स्थितियों के प्रबंधन में समग्र दृष्टिकोण के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा की पारंपरिक प्रणालियों को आधुनिक पद्धतियों के साथ जोड़ने से देखभाल के नये रास्ते खुल सकते हैं। उनके अनुसार, तकनीक को मानवता की सेवा करनी चाहिए, न कि मानवता को तकनीक की। सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने ऑटिज्म की जल्द पहचान और नयी तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग पर अपने अनुभव साझा किये।

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