इटावा , अप्रैल 1 -- श्रीवृन्दावन धाम के प्रमुख संत एवं श्री राधा-कृष्ण के अनन्य उपासक स्वामी प्रेमानन्द महाराज के जीवन और उनके उपदेशों पर आधारित पहली पुस्तक 'परम सुख' का प्रकाशन किया गया है।

पुस्तक के लेखक एवं संपादक राधेकृष्ण ने स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज से भेंट कर उन्हें इसकी प्रथम प्रति समर्पित की और आशीर्वाद प्राप्त किया। पुस्तक के संपादन में आईपीएस घनश्याम चौरसिया का विशेष योगदान रहा है। राधेकृष्ण ने बताया कि 320 पृष्ठों की यह पुस्तक दो भागों में विभाजित है। पहले भाग में स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के जीवन का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसमें उनके जन्म, प्रारंभिक जीवन, वैराग्य, साधना और वृन्दावन आगमन तक की यात्रा शामिल है। उनका मूल नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय था और उनका जन्म कानपुर के एक धार्मिक परिवार में हुआ था।

पुस्तक में उल्लेख है कि मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़कर ईश्वर की खोज का मार्ग अपनाया और बाद में काशी में कठोर तपस्या के पश्चात वृन्दावन आकर श्री राधा-कृष्ण की भक्ति में जीवन समर्पित कर दिया। दूसरे भाग में स्वामी जी के लगभग 400 उपदेशों को संकलित किया गया है, जिनमें भक्ति, संयम, अनुशासन, नैतिक जीवन और समाज सुधार के संदेश शामिल हैं। उनके प्रमुख उपदेशों में नाम जप को ईश्वर प्राप्ति का सरल माध्यम बताया गया है, साथ ही युवाओं को संयम और अनुशासन अपनाने तथा अभिभावकों को बच्चों में अच्छे संस्कार देने की प्रेरणा दी गई है।

पुस्तक की प्रस्तावना काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र ने लिखी है। इसका प्रकाशन ईकोक्रेजी कम्युनिकेशन्स द्वारा किया गया है, जबकि वितरण का कार्य सृजन प्रकाशन को सौंपा गया है। यह पुस्तक स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के जीवन और विचारों को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास मानी जा रही है।

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