ऋषिकेश , अगस्त 28 -- श्रावणी पूर्णिमा पर उत्तराखंड की योग नगरी ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में रक्षाबंधन के पावन त्योहार को आध्यात्मिक चेतना, सनातन संस्कारों और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ मनाया गया। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती ने अमेरिका में रक्षाबंधन का पावन त्योहार विशिष्ट तरीके से मनाया।

उन्होंने इस त्यौहार के संदेश को परिवार और रिश्तों से आगे बढ़ाकर समाज, संस्कृति और प्रकृति से जोड़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर पौधों को रक्षासूत्र बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लिया।

उन्होंने यह संदेश दिया कि जिस प्रकार राखी की डोर हमें अपने प्रियजनों की रक्षा और उनके प्रति अपने दायित्व का स्मरण कराती है, उसी प्रकार हमें पृथ्वी, जल, वायु, वन और वृक्षों के संरक्षण का भी संकल्प लेना होगा।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि रक्षाबंधन प्रेम और संरक्षण की संस्कृति का त्योहार है। राखी की छोटी-सी डोर हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है, जिससे प्रेम हो, उसकी रक्षा का दायित्व भी हमारा है। आज आवश्यकता है कि हम इस रक्षा-सूत्र को परिवार की सीमाओं से आगे ले जाकर समाज और प्रकृति से जोड़ें। हमारी नदियाँ, वृक्ष, पर्वत, वन और धरती माता भी हमारी जिम्मेदारी हैं। यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो प्रकृति आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करेगी।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया अनेक पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति का यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का संस्कार देता है। एक वृक्ष को रक्षासूत्र बांधना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह स्वयं से किया गया संकल्प है कि हम वृक्षों को बचाए, अधिक से अधिक पौधे लगाएं और प्रकृति के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ करें।

ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में इस पावन अवसर पर ऋषिकुमारों का उपनयन संस्कार विधिवत सम्पन्न हुआ। ऋषिकुमारों ने आचार्यों के सान्निध्य में वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ विधिवत पूजा-अर्चना की और अपनी जीवन-यात्रा को ज्ञान एवं संस्कारों से प्रकाशित करने का संकल्प लिया। वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि, यज्ञ की सुगंध और आध्यात्मिक वातावरण ने श्रावणी पूर्णिमा के इस अवसर को और भी दिव्य बना दिया। यह आयोजन एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा, ज्ञान-संस्कृति और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बना।

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