नयी दिल्ली , अगस्त 25 -- वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् की राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशाला ( सीएसआईआर-एनएएल) ने मंगलवार को यहां तीन स्वदेशी अत्यंत सूक्ष्म और लघु आकार के तीन नये गैस टर्बाइन इंजन पेश किये। इनमें 05 किलोग्राम प्रणोदक बल वाला एनजे-05, 50 किलोग्राम प्रणोद वाला एनजे-50 और 100 किलोग्राम प्रणोद वाला एनजे-100 इंजन है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि यह उन्नत वायुयान प्रणोदक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। यह गैस टर्बाइन इंजन स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों में महत्वपूर्ण आवश्यकताएं पूरी करने हेतु विकसित किए गए हैं। ये छोटे और सुव्यवस्थित प्रणोदन प्रणाली सामरिक मानवरहित यूएवी, ड्रोन इंटरसेप्टर और सघन मिसाइल प्रणाली सहित विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए निर्मित किए गए हैं।

इन लघु गैस टर्बाइन इंजनों के उद्घाटन कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ रक्षा और वैज्ञानिक प्रतिष्ठनों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष के एकीकृत रक्षा स्टाफ प्रमुख, एयर मार्शल तेजिंदर सिंह इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे।

कार्यक्रम में सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ (श्रीमती) एन कलाइसेल्वी और सीएसआईआर-एनएल के निदेशक डॉ अभय ए पशिलकर शामिल थे।

डॉ. पशिलकर ने अपने स्वागत संबोधन में देश के बढ़ते ड्रोन पारितंत्र के बहु-स्तरीय समेकित ढ़ांचा तैयार करने में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्-राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशाला की उभरती भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तेजी से विस्तार कर रहे एयरोस्पेस स्टार्टअप पारितंत्र वाले भारतीय उद्योग की देश की रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने में बड़े पैमाने पर ऐसे उन्नत इंजनों की उत्पादन क्षमता है।

इस अवसर पर आर. प्रथापनायका के नेतृत्व में सीएसआईआर-एनएएल की वैज्ञानिक टीम ने गैस टरबाइन इंजन विकसित किए जाने संबंधी तकनीकी प्रस्तुति दी जिसमें उच्च-आरपीएम टर्बोमशीनरी और उच्च-तापमान दहन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति की जानकारी दी, जिससे ये स्वदेशी प्रणोदन प्रणाली विकसित हो पाई हैं।

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद महानिदेशक और वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग सचिव डॉ. श्रीमती एन. कलाइसेल्वी ने अपने संबोधन में परियोजना दल के सहयोगात्मक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने बल देकर कहा कि इस तरह के अत्यधिक विशिष्ट और महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों को स्वदेशी तौर पर विकसित किया जाना, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ने की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि है।

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