(संजय कौशिक)मोतिहारी , अक्टूबर 30 -- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कर्मभूमि चंपारण में उच्च शिक्षा के विस्तार और क्षेत्रीय विकास की उम्मीदों के साथ स्थापित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय को एक दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद अपना स्थायी परिसर नसीब नहीं हो सका है।

विश्वविद्यालय के शिक्षण संकायों से लेकर कुलपति कार्यालय तक आज भी निर्धारित स्थायी परिसर से बाहर संचालित हो रहे हैं। इस बीच, परिसर निर्माण के लिए उपलब्ध कराई गई 61 एकड़ जमीन को बाढ़ग्रस्त बताए जाने का मामला सामने आने से परियोजना के भविष्य को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

स्थानीय सांसद एवं पूर्व केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है।

सांसद राधामोहन सिंह ने 11 अक्टूबर 2026 को लिखे पत्र में विश्वविद्यालय के लिए आवंटित जमीन को बाढ़ग्रस्त बताए जाने संबंधी दावे को भ्रामक और तथ्यों के विपरीत करार दिया है। उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद लंबे समय तक बिहार सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। लगातार प्रयासों के बाद पिछले दो वर्षों में 61 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई और विश्वविद्यालय को उसका कब्जा भी सौंप दिया गया। इस संबंध में स्थायी परिसर के निर्माण के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कर सरकार को भेजा जा चुका है। ऐसे में जमीन को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बताने से निर्माण प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक भ्रम और संशय पैदा हो रहा है।

सांसद ने पत्र में उल्लेख किया है कि उन्हें जानकारी मिली है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के सचिव की ओर से बिहार सरकार को पत्र भेजकर आवंटित जमीन को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बताया गया है। उनका मानना है कि यह मामला संभवतः प्राक्कलन समिति की ओर से उठाई गई आपत्तियों से जुड़ा है। उन्होंने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अंचल कार्यालय के राजस्व अभिलेख, पिछले कई दशकों के बाढ़ मानचित्र और संबंधित क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति जमीन को बाढ़ प्रभावित घोषित करने की पुष्टि नहीं करते। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय के लिए चिह्नित भूमि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में नहीं आती है।

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