शिमला , फरवरी 27 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के बागवानी विभाग के एक स्थानांतरण आदेश को मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है।

न्यायालय की एकल पीठ ने कहा कि स्थानांतरण 'स्थापित सेवा मानदंड' होना चाहिए न कि पसंदीदा अधिकारी को संरक्षण प्रदान करने का साधन। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अध्यक्षता वाली उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने गुरुवार को एक राज्य कर्मचारी को रामपुर उपमंडल के ननखड़ी में उसकी तैनाती से डोडरा क्वार स्थानांतरित करने के सरकार के निर्णय को रद्द कर दिया।

बागवानी में सबजेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट (एसएमएस) के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ता ने आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह प्रशासनिक आवश्यकता के बिना पारित किया गया था और सरकार द्वारा पसंदीदा अन्य अधिकारियों को नियुक्त करने की इच्छा से प्रेरित था। सार्वजनिक सेवा में समानता और निष्पक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों को सुदृढ़ करने वाले इस फैसले में अदालत ने माना कि कुछ अधिकारियों के पक्ष में प्रशासनिक शक्ति का मनमाना उपयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है।

उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता केवल सात महीने से ननखड़ी में तैनात था। इससे पहले, उसने रोहड़ू में पूरे तीन साल का कार्यकाल पूरा किया था, जो 'रोटेशनल' स्थानांतरण के लिए मान्यता प्राप्त प्रशासनिक मानदंडों के अनुरूप है।

राज्य सरकार ने स्थानांतरण का बचाव करते हुए दावा किया कि यह 'जनहित' में था, लेकिन अदालत को इस दावे को सही ठहराने के लिए कोई सामग्री रिकॉर्ड पर कोई सामग्री नहीं मिली। आधिकारिक फाइल में तात्कालिक जरूरत या आवश्यकता या फिर कोई नेक नियत का संदर्भ नहीं था।

अदालत ने कहा, " केवल जनहित का दावा पर्याप्त नहीं है। फाइल कोई वस्तुनिष्ठ कारण प्रकट नहीं करती है और प्रशासनिक कार्रवाई बाहरी विचारों से प्रभावित प्रतीत होती है।" अदालत ने स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि यह कार्रवाई मनमानी और असंगत हैं।

पीठ ने जोर दिया कि राज्य की कार्रवाई निष्पक्ष और कानूनी सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि मनमाना व्यवहार तर्कसंगत प्रशासनिक निर्णय का स्थान नहीं ले सकता।

अदालत ने नोट किया कि जिन अधिकारी को ननखड़ी स्थानांतरित किया जा रहा था, उन्हें स्थानांतरण यात्रा भत्ता (टीटीए) नहीं दिया गया है, जो दर्शाता है कि उनका स्थानांतरण उनके अनुरोध पर किया जा रहा था, न कि विभागीय आवश्यकता के कारण। अदालत ने कहा कि यह दिखाता है कि फेरबदल संगठनात्मक जरूरतों को पूरा करने के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर किया गया है।

सार्वजनिक रोजगार में समानता और समान अवसर के अधिकार की गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला देते हुए पीठ ने माना कि प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए, जो बिना किसी तर्कसंगत औचित्य के दूसरों के अधिकारों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है और किसी और को विशेषाधिकार देता हो।

अदालत ने स्वीकार किया कि प्रथम श्रेणी (क्लास 1) अधिकारियों का किसी भी स्टेशन पर वैधानिक रूप से निश्चित कार्यकाल नहीं होता है, लेकिन साथ हीयह भी कहा कि बिना किसी प्रशासनिक तर्क के केवल सात महीने की तैनाती को भी किसी सेवा कानून के अनुसार सही नहीं ठहराया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को 'उचित अवधि' के लिए ननखड़ी में अपनी सेवा जारी रखने की अनुमति देने का आदेश दिया।

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