नयी दिल्ली , फरवरी 21 -- भारत के कबाड़ और रिसाइक्लिंग बाजार को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए व्यापक संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। उद्योग जगत के नेताओं और नीति निर्माताओं ने यहां पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा मेटलएक्स के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में यह बात कही।

'री-इमैजिनिंग इंडियाज़ स्क्रैप एंड रीसाइक्लिंग मार्केट' विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में सरकारी अधिकारी, नियामक संस्थाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, रीसाइक्लर, वित्तीय संस्थान और प्रौद्योगिकी प्रदाता शामिल हुए। सम्मेलन में रीसाइक्लिंग वैल्यू चेन में पारदर्शिता, सुशासन और संस्थागत भरोसा बढ़ाने पर मंथन किया गया।

पीएचडीसीसीआई के उप महासचिव डॉ. जतिंदर सिंह ने कहा कि देश के लगभग 60 से 70 प्रतिशत कबाड़ी बाजार का संचालन अनौपचारिक रूप से हो रहा है, जहां 25 से 30 प्रतिशत तक मिलावट और मूल्य अस्थिरता की समस्या एमएसएमई के लिए चुनौती बनी हुई है। उन्होंने बाजार के औपचारिकीकरण, डिजिटल परिवर्तन, वित्त तक बेहतर पहुंच और आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने केन्द्रीय बजट 2026 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रोत्साहन और शुल्क छूट के माध्यम से भारत को वैश्विक रीसाइक्लिंग हब के रूप में स्थापित किया जा सकता है, जहां स्वच्छ भारत 2.0 के तहत लगभग 17 अरब अमेरिकी डॉलर का अवसर है।

पीएचडीसीसीआई की खनिज एवं धातु समिति के अध्यक्ष विजय शर्मा ने कहा कि कबाड़ प्रबंधन अब केवल एक परिचालन मुद्दा नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा और स्थिरता से जुड़ा रणनीतिक विषय बन गया है। उन्होंने बताया कि एक टन पुनर्चक्रित स्टील से 1.1 टन लौह अयस्क और 630 किलोग्राम कोकिंग कोयले की बचत होती है, साथ ही उत्सर्जन में करीब 28 प्रतिशत की कमी आती है। उन्होंने विभाजित बाजार संरचना, मानकीकरण की कमी, मूल्य अस्थिरता, तकनीक और पूंजी की कमी तथा भरोसे की कमी को प्रमुख चुनौतियां बताया और स्क्रैप को रणनीतिक वस्तु के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता जताई।

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