मुंबई , फरवरी 28 -- सोनी सब के कलाकारों ने होली से जुड़ी यादों को प्रशंसकों के साथ साझा किया है।

पुष्पा इम्पॉसिबल में पुष्पा का किरदार निभा रही करुणा पांडे ने कहा, "मेरी सबसे मज़ेदार होली की याद स्कूल के दिनों की है, जब मेरे पिता शिलॉन्ग में पोस्टेड थे। माँ ने हमें केवल एक-दो घंटे खेलने को कहा था, लेकिन हम सुबह से शाम तक रंगों में डूबे रहे। जब माता-पिता हमें ढूँढने आए, तो पहचान ही नहीं पाए कि उनका बच्चा कौन है। हम काले और हरे रंग में पूरी तरह ढके हुए छोटे-छोटे भूत जैसे लग रहे थे! आज भी वह याद मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। वही बेफिक्र खुशी मेरे लिए होली का असली मतलब है।

इत्ती सी खुशी में संजय का किरदार निभा रहे ऋषि सक्सेना ने कहा, "बचपन में होली वह दिन था जब हमें खुलकर शरारत करने की आज़ादी मिलती थी और डाँट नहीं पड़ती थी। मुझे याद है कि हम पहले से तय करते थे कि किस दोस्त को निशाना बनाना है और फिर भागने का नाटक करते थे, लेकिन लौटते समय रंगों से भरी बाल्टी लेकर आते थे। दिन के अंत तक कोई पहचान में नहीं आता था और असली संघर्ष घर पर शुरू होता था, जब रंग कई दिनों तक नहीं उतरते थे। मुझे लगता है मैंने रंग लगाने से ज़्यादा समय उन्हें छुड़ाने में बिताया है! उतनी ही गहरी याद है घर लौटकर ताज़ा गुजियों की खुशबू। उत्तर भारत में होली गुजियों के बिना अधूरी लगती है। आज भी जब होली याद आती है, तो वही बेफिक्र मस्ती आँखों के सामने आ जाती है। यह एक ऐसा त्योहार है जिसमें आप पूरी तरह बच्चे बन सकते हैं।"पुष्पा इम्पॉसिबल में दीप्ति का किरदार निभा रही दीक्षा जोशी ने कहा,"पिछले कुछ वर्षों से मैं मुंबई में होली मना रही हूँ। हम अक्सर माध आइलैंड, रहेजा टाउनशिप जाते हैं, जहाँ करीबी दोस्त इकट्ठा होते हैं। वहाँ रंग, संगीत और हँसी का माहौल होता है। लेकिन मुझे घर की बनी गुजिया और पुए की बहुत याद आती है, खासकर पहाड़ी परिवारों द्वारा होली और दिवाली पर बनाए गए पकवानों की। उन स्वादों में कुछ ऐसा है जो तुरंत घर की याद दिला देता है। मुझे रंगों से खेलना अच्छा लगता है, लेकिन मैं हर्बल रंगों को प्राथमिकता देती हूँ और त्योहार को आनंद और गरिमा के साथ मनाना पसंद करती हूँ। मेरे लिए होली का मतलब है,मस्ती करना लेकिन त्योहार की गरिमा बनाए रखना।"गणेश कार्तिकेय में पार्वती का किरदार निभा रही श्रेनु पारिख ने कहा,"मेरे लिए होली हमेशा घर और बैकग्राउंड में बजता हुआ संगीत रही है। वडोदरा में होली केवल चेहरे पर रंग लगाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि हम हफ्तों पहले दिन की योजना बनाते थे। दोस्तों के साथ तय करते थे कि क्या पहनना है, यह जानते हुए कि एक घंटे में सब खराब हो जाएगा। दोपहर तक हम सब पहचान में नहीं आते थे, एक-दूसरे पर हँसते, मिठाइयाँ बाँटते और दिन खत्म होने नहीं देते थे। मुझे याद है कि घर लौटते समय बालों में रंग कई दिनों तक रहता था। गालों पर जमी जिद्दी गुलाबी रंग की परत मानो सम्मान का प्रतीक लगती थी। आज भी होली मुझे वही शुद्ध और बेफिक्र खुशी की याद दिलाती है।

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