देहरादून , सितम्बर 05 -- उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने देहरादून में सैन्य धाम के निर्माण और उसके लोकार्पण संबंधी कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के बयान पर शनिवार को तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि शहीदों की कुर्बानी को चुनावी लाभ के तराजू पर तौलना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बेहद संकीर्ण और संवेदनहीन मानसिकता का परिचायक है। उन्होंने कहा कि मंत्री श्री जोशी का यह कहना कि "हम राजनीतिक दल हैं, इसका चुनावी लाभ लेंगे, हम साधु-संत नहीं हैं" केवल एक बयान नहीं, बल्कि शहीदों और उनके परिवारों के प्रति भाजपा सरकार की सोच का पर्दाफाश है।

श्री गोदियाल ने कहा कि शहीदों के नाम पर बने स्मारक को पांच वर्षों तक लटकाए रखना और फिर चुनाव नजदीक आते ही उसके राजनीतिक लाभ की बात करना उन परिवारों का अपमान है, जिन्होंने देश के लिए अपने बेटे, पति, पिता और भाई खोए हैं। उन्होंने कहा कि श्री जोशी को शहादत और सत्ता की राजनीति के बीच का फर्क समझना चाहिए। सैन्य धाम किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह उत्तराखंड की सैन्य परंपरा, वीर जवानों की शहादत और उनके परिवारों की भावनाओं का प्रतीक है। यदि शहीदों के घरों की मिट्टी लाकर इस धाम का निर्माण किया गया है, तो उस पवित्र मिट्टी को चुनावी फायदे के चश्मे से देखना और भी दुर्भाग्यपूर्ण है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने सवाल किया कि क्या श्री गणेश जोशी किसी शहीद की विधवा के सामने खड़े होकर यह कह सकते हैं कि सैन्य धाम का लोकार्पण इसलिए रोका गया क्योंकि भाजपा को चुनाव में इसका लाभ लेना था, क्या वह उन मासूम बच्चों की आंखों में आंख डालकर यह बात कह पाएंगे, जिनके सिर से उनके पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया? क्या वह उन बूढ़े मां-बाप से यह कह सकते हैं, जिनकी बुढ़ापे की लाठी देश के लिए शहीद हो गई? क्या वह उस बहन से यह कह सकते हैं, जिसकी कलाई आज भी अपने भाई की राखी का इंतजार करती है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड केवल देवभूमि नहीं, बल्कि वीरभूमि और सैन्य भूमि भी है। यहां शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका सेना से किसी न किसी रूप में संबंध न हो। ऐसे प्रदेश में शहादत को चुनावी लाभ से जोड़ना उत्तराखंड की सैन्य परंपरा और सैनिक परिवारों की भावनाओं का सीधा अपमान है।

श्री गोदियाल ने सैन्य धाम की लागत को लेकर भी सरकार पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जिस परियोजना की लागत के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, उसकी लागत में भारी वृद्धि की चर्चाएं सामने आई हैं। जिस परियोजना की निगरानी सरकार के हाथ में हो और उसी परियोजना में लागत लगातार बढ़ती जाए, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है।

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