खरगोन , जून 30 -- मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के बड़वाह शिक्षा विभाग में सेवानिवृत्त एवं मृत शिक्षकों के लगभग सात लाख रुपये के गबन से जुड़े करीब 25 वर्ष पुराने मामले में अपीलीय न्यायालय ने निचली अदालत के दोषमुक्ति आदेश को निरस्त करते हुए तत्कालीन लेखापाल और स्थापना शाखा के सहायक ग्रेड-दो (लिपिक) को सात-सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
अभियोजन के अनुसार वर्ष 2000-01 में विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, बड़वाह में सेवानिवृत्त एवं मृत शिक्षकों के समर्पित अवकाश और समूह बीमा की राशि के भुगतान में अनियमितता सामने आई थी। आरोप था कि तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी भीमसिंह सेंगर, लेखापाल मुकुन्द जोगदण्ड, स्थापना शाखा के सहायक ग्रेड-दो राजेन्द्र कुमार त्रिवेदी तथा भृत्य करणसिंह सोलंकी ने आपसी मिलीभगत से शासकीय अभिलेखों में हेराफेरी कर फर्जी हस्ताक्षर और कूटरचित भुगतान रसीदों के आधार पर वास्तविक हितग्राहियों को भुगतान किए बिना करीब सात लाख रुपये की शासकीय राशि का गबन किया।
प्रकरण का खुलासा 19 जुलाई 2001 को शिकायत के बाद हुई जांच में हुआ। जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होने पर बड़वाह थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468 और 34 के तहत प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की गई।
मामले में चार आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया गया था। विचारण के दौरान तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी भीमसिंह सेंगर और भृत्य करणसिंह सोलंकी की मृत्यु हो जाने से उनके विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही समाप्त हो गई। इसके बाद मुकदमे में केवल मुकुन्द जोगदण्ड और राजेन्द्र कुमार त्रिवेदी के विरुद्ध सुनवाई जारी रही।
विचारण न्यायालय ने 30 मार्च 2022 को साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया था। इसके विरुद्ध राज्य शासन ने अपील दायर की। चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ ने दस्तावेजी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और वित्तीय अभिलेखों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए निचली अदालत का निर्णय निरस्त कर दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया।
न्यायालय ने दोनों आरोपियों को सात-सात वर्ष के कठोर कारावास तथा अर्थदंड से दंडित किया। अर्थदंड अदा नहीं करने पर अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। निर्णय के बाद दोनों को जिला जेल खरगोन भेज दिया गया।
अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि लोक सेवकों पर शासकीय धन की सुरक्षा और उसका विधिसम्मत वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है। कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर शासकीय राशि का गबन करना गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है, ताकि लोक सेवकों द्वारा शासकीय धन के दुरुपयोग पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
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