बैतूल , अगस्त 07 -- जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ने सामुदायिक वन अधिकारों और राजस्व अभिलेखों में दर्ज जंगल मद की भूमि के मामले में बैतूल, मुलताई और भैंसदेही के अनुविभागीय अधिकारियों (राजस्व) पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और शासन के निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाया है। संगठन ने संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय विधिक सेवा प्राधिकरण से निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।

जयस का दावा है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार राजस्व ग्रामों के निस्तार पत्रकों में बड़े झाड़ और छोटे झाड़ के जंगल मद में दर्ज भूमि का नियंत्रण, प्रबंधन और अधिकार पंचायती राज संस्थाओं को सौंपे जाने चाहिए। संगठन का आरोप है कि संबंधित कानूनों और मध्यप्रदेश शासन के निर्देशों के बावजूद जिले में इनका पालन नहीं किया गया।

संगठन के अनुसार राजस्व अभिलेखों में सार्वजनिक एवं निस्तारी प्रयोजनों के लिए दर्ज जंगल मद और गैर जंगल मद की भूमि को वन विभाग ने संरक्षित वन घोषित कर दिया अथवा आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया में शामिल कर लिया है। साथ ही इन क्षेत्रों को वर्किंग प्लान में शामिल कर उनका नियंत्रण अपने अधीन ले लिया गया है।

जयस ने आरोप लगाया कि आयुक्त, आदिवासी विकास द्वारा 16 अप्रैल 2015 को जारी निर्देशों के बावजूद बैतूल, मुलताई और भैंसदेही के अनुविभागीय अधिकारियों ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रावधानों के तहत लंबित प्रकरणों की जांच कर सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

संगठन का कहना है कि संबंधित अधिकारी आवश्यक जांच पूरी किए बिना सामुदायिक भूमि को आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं, जो सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और शासन के निर्देशों के विपरीत है। जयस ने चेतावनी दी है कि यदि विधिक सेवा प्राधिकरण से सहायता नहीं मिली तो संगठन नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष धरना देगा। इस संबंध में राज्य शासन के संबंधित विभागों और अधिकारियों को भी सूचना भेजी गई है।

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