नयी दिल्ली , जून 24 -- उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि स्व-वित्तपोषित निजी मेडिकल कॉलेजों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण केवल प्रवेश के स्तर पर लागू होता है और यह सरकारी मेडिकल कॉलेजों के जैसी कम फीस का कोई अधिकार नहीं देता है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्व-वित्तपोषित निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस ढांचे को चुनौती देने वाली एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि स्व-पोषित निजी संस्थानों से सरकारी कॉलेजों के समान फीस लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि सरकारी कॉलेजों को राज्य से भारी वित्तीय सहायता मिलती है।

याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया था कि आठ लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा वाले ईडब्ल्यूएस परिवारों से आने वाले छात्र निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस कैसे वहन कर सकते हैं, जो प्रति वर्ष लगभग 19 लाख से 25 लाख रुपये तक है।

हालांकि, न्यायालय ने कहा कि केवल वहन करने की क्षमता अपने आप में निजी संस्थानों को ईडब्ल्यूएस छात्रों के लिए सरकारी स्तर की फीस वसूलने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं हो सकती। पीठ ने कहा कि जो लोग फीस देने में असमर्थ हैं, वे छात्रवृत्ति और सरकारी सहायता का विकल्प चुन सकते हैं।

टीएमए पाई फाउंडेशन मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हालांकि कैपिटेशन फीस लेने पर रोक है, लेकिन निजी संस्थान कानून के अनुसार तय और सक्षम शुल्क नियामक समिति द्वारा स्वीकृत फीस लेने के हकदार हैं।

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