बेंगलुरु , अगस्त 25 -- कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने मंगलवार को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से अनुसूचित जातियों (एससी) के बीच आंतरिक आरक्षण से जुड़ी बाधाओं को दूर करने और इसे लागू करने का आग्रह करते हुए कहा कि सरकार का प्रमुख न रहने के बावजूद वे सामाजिक न्याय के मुद्दे का समर्थन करते रहेंगे।

श्री सिद्दारमैया ने आंतरिक आरक्षण पर आयोजित एक सेमिनार में कहा कि अब उनके पास कोई कार्यकारी अधिकार नहीं है लेकिन वे आरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध हैं और मुख्यमंत्री तथा संबंधित मंत्रियों के साथ इस मुद्दे पर बात करेंगे। उन्होंने कहा, "मैं अब सरकार का प्रमुख नहीं हूं और मेरे पास कोई शक्ति नहीं है। लेकिन मैं आंतरिक आरक्षण, आरक्षण प्रणाली और सामाजिक न्याय का समर्थक हूं। मैंने इस मुद्दे पर कभी समझौता नहीं किया है और भविष्य में भी नहीं करूंगा।"श्री सिद्दारमैया ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन समुदायों को अवसर प्रदान करना है जो जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं। उन्होंने कहा, "जब तक सभी को समान अवसर नहीं मिलते, तब तक असमानता खत्म नहीं होगी।" उन्होंने जोर देकर कहा कि एक समान समाज के निर्माण के लिए वंचित समुदायों का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण आवश्यक है।

उन्होंने आंतरिक आरक्षण के मुद्दे पर याद दिलाया कि यह संघर्ष लगभग तीन दशकों से चल रहा है और कहा कि सब-क्लासिफिकेशन (उप-वर्गीकरण) पर उच्चतम न्यायालय के फैसले ने इस मांग को नयी गति दी है। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व वाली सरकार ने नागमोहन दास समिति का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट सौंपने से पहले गांवों का दौरा किया और लोगों से बातचीत की। उन्होंने कहा, "रिपोर्ट के आधार पर हमने आरक्षण को पांच समूहों में विभाजित किया। बाद में 6:6:5 फॉर्मूले के तहत पांच समूहों को पुनर्गठित करके तीन समूह बना दिए गए।" बाद में हालांकि इस पुनर्वर्गीकरण का विरोध हुआ और उच्च न्यायालय में कानूनी चुनौतियां सामने आईं। उन्होंने कहा कि एक अंतरिम व्यवस्था पर चर्चा हुई, जिसमें 15 प्रतिशत आरक्षण को 5.5 प्रतिशत, 5.5 प्रतिशत और चार प्रतिशत के रूप में बांटने का प्रस्ताव भी शामिल था।

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