बेंगलुरु , मई 30 -- कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने जाते-जाते राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की तैयार की गयी 'सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट' को मंजूर कर कांग्रेस नेतृत्व को असमंजस की स्थिति में खड़ा कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि सियासत में कभी-कभी ऐसे लम्हे आते हैं जब कोई सरकारी फाइल सिर्फ आगे नहीं बढ़ती, बल्कि उसका अपना एक अलग वजूद बन जाता है। कर्नाटक की जातिगत सर्वेक्षण रिपोर्ट भी एक ऐसा ही मोहरा है। जहां निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जिस अफसरशाही इत्मीनान और राजनीतिक अंतिम रूप के साथ इसे मंजूर किया है, उसने खामोशी से वही काम करना शुरू कर दिया है, जो आंकड़े अक्सर सबसे बेहतर तरीके से करते हैं- ताकतवरों की नींद उड़ाना।
रिपोर्ट की मंजूरी देने की एक आम प्रक्रिया है लेकिन इसके भीतर ज्यादा दिलचस्प हलचल छिपी हुई है। राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी अब खुद को ऐसी असहज स्थिति में पा रहे हैं, जहां उन्हें एक ऐसे दस्तावेज़ पर जवाब देना भारी पड़ रहा है। वे उसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकते।
कर्नाटक के सियासी मिजाज के मंझे खिलाड़ी श्री सिद्दारमैया ने शायद वही किया है, जो तजुर्बेकार सियासतदान अक्सर सबसे बेहतर तरीके से करते हैं- एक ऐसा माहौल छोड़ जाना, जो कानूनी तौर पर तो बिल्कुल साफ-सुथरा हो लेकिन राजनीतिक रूप से काफी उलझा हुआ हो। यह रिपोर्ट एक बार मंजूर होने के बाद अब सिर्फ कोई सुझाव नहीं रह गयी है। यह एक ऐसा सवाल बन चुकी है, जो जवाब के इंतजार में है।
श्री शिवकुमार के लिए यह मुद्दा फिलहाल सबसे अहम है और सीधे उनके क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। राज्य का जातीय समीकरण कभी भी हवा-हवाई नहीं होता। यह उन समुदायों के रूप में सामने आता है, जो पुरानी बातें याद रखते हैं, ऐतराज जताते हैं और एकजुट होते हैं। वोक्कालिगा समुदाय का एक वर्ग, जो पहले भी जातीय सर्वेक्षण को लेकर हुए विवादों को लेकर संवेदनशील रहा है, इसके क्रियान्वयन की दिशा में उठाए जाने वाले किसी भी कदम पर कड़ी और सतर्क निगाह रख सकता है। पद्धति और आंकड़ों पर बहस भले ही दफ्तरों में हो, लेकिन पहचान और प्रतिनिधित्व का सवाल सड़कों पर तय होता है।
श्री राहुल गांधी की परेशानी का स्तर थोड़ा अलग है। जातिगत जनगणना के हक में उनका लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक रुख अब इसे अमली जामा पहनाने में टेडी खीर नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी आदत के मुताबिक, इस सूरत-ए-हाल को नीति के विकास के रूप में नहीं, बल्कि एक सियासी विरोधाभास के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एक भाषा बोलती है और राज्यों में दूसरी। कांग्रेस जैसा लाजिमी है, इस बात से सरासर इनकार करती है।
अब कांग्रेस के सामने दो रास्ते खुलते हैं, और दोनों में से कोई भी रास्ता आरामदेह नहीं है। अगर इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया जाता है, तो इसके प्रशासनिक ईमानदारी और फिर उसके बाद आने वाली राजनीतिक हिचकिचाहट का एक और भारतीय उदाहरण बन जाने का खतरा है। इसने पिछड़े समुदायों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों के बीच जो उम्मीदें जगाई हैं, वे इतनी आसानी से खत्म नहीं होंगी। ऐसी सूरत में इस रिपोर्ट को इस बात के लिए कम याद किया जायेगा कि इसमें क्या कहा गया था, बल्कि इस बात के लिए ज्यादा याद किया जायेगा कि इसके साथ क्या नहीं किया गया।
अगर इसे लागू किया जाता है, तो इसके नतीजे ज्यादा त्वरित और साफ तौर पर दिखाई देने वाले होंगे। आरक्षण का नये सिरे से निर्धारण समुदायों का प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकीय दावे सक्रिय रूप से राजनीति के केंद्र में आ जायेंगे। समर्थन और विरोध दोनों एक साथ खड़े होंगे। कानूनी पेचीदगियां सामने आ सकती हैं। प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं तथा गठबंधन को संभालना और भी मुश्किल हो जायेगा।
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