रायपुर , अगस्त 10 -- सावन माह के दूसरे सोमवार पर पूरा छत्तीसगढ़ शिवभक्ति में डूबा नजर आ रहा है । प्रदेशभर के प्रमुख शिवालयों में ब्रह्म मुहूर्त से ही भगवान शिव के जलाभिषेक और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। दूर-दराज के क्षेत्रों से कांवड़िए और भक्त मंदिरों में पहुंच रहे हैं। शिवालयों में हर-हर महादेव और बम भोले के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
सावन का सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्रद्धालु व्रत रखकर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव की आराधना कर रहे हैं।
इस बार सावन के दूसरे सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का भी दुर्लभ संयोग बना है। करीब 6 साल बाद सावन सोमवार और प्रदोष व्रत एक साथ पड़ रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, जबकि प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा और अभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। सावन सोमवार और प्रदोष के एक साथ आने से शिव आराधना, जलाभिषेक और अभिषेक को विशेष फलदायी माना जा रहा है।
राजधानी रायपुर के विभिन्न शिव मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गई। ब्रह्म मुहूर्त से भक्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए मंदिर पहुंचने लगे थे। मंदिर परिसरों में हर-हर महादेव के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की और सुख-समृद्धि एवं मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की।
गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर स्थित फणीकेश्वर नाथ महादेव मंदिर में भी सावन के दूसरे सोमवार पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। ब्रह्म मुहूर्त से भक्त जल लेकर मंदिर पहुंचे और भगवान शिव का जलाभिषेक किया। मंदिर परिसर में बम भोले के जयकारों से माहौल शिवमय बना रहा। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं और कांवड़ियों ने भगवान फणीकेश्वर नाथ के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।
सावन के दूसरे सोमवार पर प्रदेश के प्रमुख और प्राचीन शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और अभिषेक किया जा रहा है। इनमें (कुलेश्वर मंदिर - राजिम, रायपुर (9वीं शताब्दी), भोरमदेव मंदिर - कबीरधाम (एक हजार वर्ष पुराना), लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर - शिवरीनारायण, जांजगीर-चांपा (6 वीं शताब्दी), भूतेश्वर महादेव मंदिर - मरोदा, गरियाबंद, सुरंग टीला मंदिर - सिरपुर, महासमुंद (7 वी शाताब्दी), पातालेश्वर/केदारेश्वर महादेव - मल्हार, बिलासपुर (13वीं-14वीं शताब्दी), देवबलोदा का प्राचीन शिव मंदिर - तहसील पाटन, दुर्ग (14वीं शताब्दी), अडभार मंदिर (भग्न शिव मंदिर) - अडभार, तहसील शक्ति, जांजगीर-चांपा (7वीं शताब्दी), महादेव मंदिर, पाली - तहसील पाली, कोरबा (8वीं-9वीं शताब्दी), पातालेश्वर महादेव मंदिर, मल्हार - तहसील मस्तूरी, बिलासपुर (12वीं शताब्दी), शिव मंदिर, गतौरा - तहसील मस्तूरी, बिलासपुर (14वीं-15वीं शताब्दी), महादेव मंदिर, बेलपान - तहसील तखतपुर, बिलासपुर (16वीं शताब्दी), महादेव मंदिर, बस्तर - तहसील बस्तर, जगदलपुर (12वीं शताब्दी) और महादेव मंदिर, नारायणपुर - तहसील कसडोल, बलौदाबाजार (13वीं-14वीं शताब्दी) शामिल हैं।
इन मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है। कई स्थानों पर मंदिर समितियों और स्थानीय प्रशासन की ओर से भीड़ को देखते हुए व्यवस्थाएं की गई हैं।
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