विद्या शंकर राय से लखनऊ , मार्च 19 -- उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में पूर्व केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी ) का अध्यक्ष बनाए जाने का फैसला महज एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की व्यापक राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा है।

भाजपा के सूत्रों के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और गैर-यादव ओबीसी राजनीति के संयोजन को मजबूत करने के साथ ही अपने सहयोगी दलों के विस्तार को रोकने की दिशा में उठाया गया है।

भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि पिछले कुछ चुनावों में यह स्पष्ट हुआ है कि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सामाजिक वर्गों में अपनी पकड़ बनाए रखना है, जो पारंपरिक रूप से उसके कोर वोटर नहीं रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में झटका लगा, जिसमें विपक्ष की 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति का असर भी देखा गया।

समाजवादी पार्टी (सपा) खासतौर पर गैर-यादव ओबीसी वर्गों को साधने की कोशिश तेज की है जिससे भाजपा के सामाजिक समीकरण प्रभावित हुए। साध्वी निरंजन ज्योति निषाद समुदाय से आती हैं, जिसकी प्रदेश की आबादी में 4 से 7 प्रतिशत हिस्सेदारी मानी जाती है। पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कई जिलों प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, मिर्जापुर, हमीरपुर और फतेहपुर में इस समुदाय का प्रभाव निर्णायक माना जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा पिछले एक दशक से कुर्मी, निषाद, मौर्य, कश्यप और लोध जैसे गैर-यादव ओबीसी समूहों पर लगातार फोकस कर रही है। इसी रणनीति के तहत पार्टी सामाजिक प्रतिनिधित्व को संस्थागत रूप देने की कोशिश कर रही है।

दरअसल, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसका दायित्व पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा और सरकार को सुझाव देना है। भले ही इसकी प्रत्यक्ष कार्यकारी शक्तियां सीमित हों, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व काफी बड़ा है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि आयोग के शीर्ष पद पर एक प्रभावशाली ओबीसी चेहरे को बैठाना यह संदेश देता है कि सरकार पिछड़े वर्गों की भागीदारी को लेकर गंभीर है।

हमीरपुर के पटेवरा गांव में जन्मी साध्वी निरंजन ज्योति का राजनीतिक सफर हिंदुत्व और ओबीसी पहचान का मिश्रण रहा है। विश्व हिन्दू परिषद और दुर्गा वाहिनी से जुड़ाव के बाद उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 2012 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2014 और 2019 में फतेहपुर लोकसभा सीट से लगातार जीत दर्ज की और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री भी रहीं। हालांकि, 2024 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में एनबीसी की जिम्मेदारी को उनके राजनीतिक पुनरुत्थान के रूप में भी देखा जा रहा है।

भाजपा के सूत्रों की मानें तो यह नियुक्ति निषाद राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संजय निषाद की अगुवाई वाली निषाद पार्टी लंबे समय से आरक्षण और उप-वर्गीकरण की मांग उठा रही है। यह कदम सहयोगी दलों को संतुलित रखने और व्यापक ओबीसी वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा है।

दरअसल संजय निषाद अभी से भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत अपने समाज को एकजुट करने में जुटे हुए हैं। इसी के तहत निषाद पार्टी गोरखपुर में 22 मार्च को बड़ी रैली के ज़रिये अपना चुनावी बिगुल फूकने की तैयारी में जुटी हुई है। इस रैली को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार निषाद पूरी तैयारी में जुटे हैं।

पार्टी की चुनावी तैयारियों को लेकर संजय निषाद ने यूनिवार्ता से कहा कि, " पार्टी अपनी चुनावी तैयारियों में जुटी हुई है। इसी के तहत 22 मार्च को गोरखपुर में एक बड़ी जनसभा आयोजित की गई है। फ़िलहाल इस जनसभा के माध्यम से करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया जाएगा। आने वाले समय में इसी तरह की जनसभाएं पूरे प्रदेश में आयोजित की जायेंगी। इसका मकसद कार्यकर्तावों को सक्रिय करना है।"भाजपा के साथ सीटों के तालमेल को लेकर फिलहाल वो ज़्यादा चिंतित नहीं हैं। निषाद पार्टी के सूत्रों की मानें तो पार्टी इस बार वर्तमान में जीती गई सीटों के अलावा कुछ हारी गई सीटों पर भी अपनी दावेदारी ठोकने की तैयारी में जुटी हुई है। निषाद पार्टी की इन तैयारियों को देखते हुए भाजपा ने भी अपनी गोटियां सेट करनी शुरू कर दी है।

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