रांची , सितंबर 16 -- झारखंड के विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो ने 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय संघ सम्मेलन के अंतर्गत आज वर्कशॉप-सी में ''जलवायु अनुकूलन और लचीलेपन में संसदीय नेतृत्व'' विषय पर केपटाउन, साउथ अफ़्रीका में चल रहे सम्मेलन में अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए।

राष्ट्रमंडल संसदीय संघ का सम्मेलन 13-19 सितंबर 2026 तक विभिन्न सत्रों में आयोजित हैं। राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की झारखंड शाखा से डेलीगेट्स के रूप में वे इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं।

''जलवायु अनुकूलन और लचीलेपन में संसदीय नेतृत्व'' विषय पर अध्यक्ष श्री महतो ने कहा कि जलवायु अनुकूलन को केवल पर्यावरण नीति का विषय नहीं, बल्कि विकास, जनसुरक्षा और आजीविका की रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम मानना चाहिए। अनियमित वर्षा, जल स्रोतों का शीघ्र सूखना, अत्यधिक गर्मी तथा कृषि और आजीविका पर बढ़ता दबाव आज हमारे लिए प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

उन्होंने कहा कि भारत ने क्लाइमेट जस्टिस को ध्यान में रखते हुए और सीबीडीआर (सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ)के सिद्धांतों को महत्व देते हुए अनुकूलन और जलवायु सहनशीलता के लिए घरेलू स्तर पर महत्वपूर्ण निवेश किया है जो वर्ष 21 -22 में यह देश की जीडीपी का 5.6% था।

भारत के नए एनडीसी के तहत 2035 तक 2005 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन तीव्रता में 47 प्रतिशत कमी, 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता और 3.5-4.0 अरब टन CO₂e अतिरिक्त कार्बन सिंक का लक्ष्य भी निर्धारित किया है।

श्री महतो ने जोर दिया कि भविष्य की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आज बनाई जा रही सड़क, स्कूल, अस्पताल और जल प्रणालियों को टिकाऊ बनाया जाना चाहिए। जलवायु संबंधी निर्णयों में किसान, वैज्ञानिक, आदिवासी समुदाय, महिलाएँ, श्रमिक, युवा और दिव्यांगजन की प्रभावी भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

बाढ़ और सूखे के बाद केवल राहत पर निर्भर रहने के बजाय पूर्व तैयारी, जल संरक्षण, वाटरशेड विकास और वर्षा जल संचयन को मजबूत करने की आवश्यकता है। लू के प्रभावों से बचाव हेतु पूर्व चेतावनी प्रणाली जैसे उपाय तथा स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करना भी जरूरी है।

झारखंड के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हमारा प्रदेश वन, जल, कृषि, खनिज, खनन और आदिवासी समुदायों की आजीविका गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप जलवायु अनुकूलन रणनीति विकसित करना आवश्यक है। संसद इसे कानून, बजट, जाँच-परख और प्रतिनिधित्व के माध्यम से इसे और अधिक सशक्त बना सकती है।

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