भोपाल , अप्रैल 29 -- मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश का समृद्ध किसान ही विकसित भारत 2047 के निर्माण की मजबूत नींव है। उन्होंने कहा कि 'सच्चा वादा और पक्का काम' के संकल्प के साथ सरकार किसानों से किए गए वादों को धरातल पर उतार रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों से किए गए हर वादे को पूरा किया जा रहा है और उनकी आय बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में राज्य में गेहूं की खरीदी 2625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जा रही है। इसमें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त बोनस दिया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि रबी विपणन वर्ष 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जिस पर राज्य सरकार 40 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दे रही है। इस प्रकार किसानों को कुल 2625 रुपये प्रति क्विंटल का लाभ मिल रहा है।

कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप कृषि विभाग द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को दोहरा लाभ दिया जा रहा है। कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए ई-कृषि यंत्र अनुदान योजना के तहत 40 से 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। प्रदेश में 2500 कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से किसान किराए पर कृषि यंत्र उपलब्ध कर रहे हैं।

मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किसानों को निःशुल्क मिट्टी परीक्षण की सुविधा दी जा रही है, जिससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग कर लागत घटाई जा सके। इसके अलावा 'मुख्यमंत्री कृषक प्रोन्नति योजना' के तहत धान उत्पादक किसानों को प्रति हेक्टेयर 4000 रुपये की सहायता दी जा रही है।

सरकार द्वारा 'पर ड्रॉप-मोर क्रॉप' योजना के अंतर्गत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर 55 प्रतिशत तक अनुदान तथा सोलर पंप पर 90 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। जायद फसलों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शामिल किया गया है और नुकसान की स्थिति में 72 घंटे के भीतर सर्वे की व्यवस्था की गई है।

कृषि मंत्री ने बताया कि मूंग, उड़द, मक्का और सूरजमुखी जैसी फसलों को बढ़ावा देकर किसान कम समय में अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। साथ ही 'कृषि चौपाल' और 'किसान पाठशाला' के माध्यम से किसानों को आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। उन्होंने किसानों से अपील की है कि नरवाई न जलाएं और फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाएं।

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