कोलकाता , अगस्त 02 -- निर्वासित बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की पुरजोर वकालत की है। इसके साथ ही उन्होंने बंगलादेश में लोकतंत्र की बहाली की मांग की और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न व बढ़ते धार्मिक कट्टरवाद पर चिंता जताते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन दोहराया।
सुश्री नसरीन ने कोलकाता में रविवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता अनिवार्य है। उन्होंने कहा, "बंगलादेश, पाकिस्तान और भारत-सभी को समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। हर देश में सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून होना चाहिए। समान कानून इसलिए जरूरी हैं क्योंकि वे महिलाओं के खिलाफ कई तरह के भेदभाव को खत्म करते हैं। यह बेहद आवश्यक है।"बंगलादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर लेखिका ने कहा कि उन्होंने कई नीतिगत फैसलों के लिए पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की आलोचना की थी, लेकिन जिस तरह से उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया गया, उसका वे समर्थन नहीं करतीं। उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं कि अवामी लीग के सभी नेता और कार्यकर्ता अपने देश लौटें और बंगलादेश में जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाल हो।
सुश्री नसरीन ने टिप्पणी की, "सुश्री हसीना को भले ही एक दिन बंगलादेश लौटने का अवसर मिल जाए, लेकिन शायद मैं कभी वापस न लौट सकूं।"चिन्मय कृष्ण दास की बंगलादेश वापसी के प्रयासों का जिक्र करते हुए सुश्री नसरीन ने कहा कि प्रगतिशील और गैर-कट्टरपंथी लोग अब भी अपनी मातृभूमि में वापस लौटने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा, "जब हर कोई अपने देश में सुरक्षित रूप से रह सकेगा, तभी यह कहा जाना संभव होगा कि वास्तविक स्वतंत्रता हासिल कर ली गई है।"धर्म और राजनीति को पूरी तरह से अलग करने की मांग करते हुए लेखिका ने मदरसा प्रणाली के स्थान पर पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और राज्य द्वारा संचालित शिक्षा प्रणाली लागू करने का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि मदरसों में व्यापक रूप से शोषण होता है, इसलिए केवल अलग-अलग दंडात्मक उपायों के बजाय शिक्षा प्रणाली में ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है।
सुश्री नसरीन ने महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करने वाली धार्मिक प्रथाओं के विरुद्ध अपने लंबे समय से चले आ रहे अभियान को दोहराते हुए कहा कि परिणामों की परवाह किए बिना वह अपनी आवाज उठाना जारी रखेंगी। उन्होंने कहा, "अगर लोग मेरी फांसी की मांग भी करते हैं, तब भी मैं किसी भी ऐसे धार्मिक नियम के खिलाफ बोलना कभी बंद नहीं करूंगी जो महिलाओं को पीछे रखता है।"लेखिका रबींद्र सदन में शनिवार को हुई उस घटना से बहुत खुश नहीं थीं, जहां दर्शकों के एक वर्ग के विरोध के बाद कवि जॉय गोस्वामी को मंच पर आने की अनुमति नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा, "केवल जॉय का ही अपमान नहीं हुआ, बल्कि मेरा भी अपमान हुआ क्योंकि मैंने ही उन्हें मंच पर आमंत्रित किया था। मैंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में बात की थी। हमारे विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन हर किसी को बोलने की अनुमति होनी चाहिए। किसी को भी अपने विचार व्यक्त करने से रोकना गलत है।"दर्शकों की प्रतिक्रिया में विरोधाभास पर सवाल उठाते हुए सुश्री नसरीन ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उनके भाषण का समर्थन करने वालों को श्री गोस्वामी के बोलने के अधिकार का भी सम्मान करना चाहिए था।
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