पटना , अगस्त 29 -- मेदान्ता हॉस्पिटल, पटना की निदेशक तथा प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष, डॉ. मीना सामंत ने शनिवार को मातृ एनीमिया के इलाज के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर बात की और कहा कि समय पर जांच और सही इलाज से इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

डॉ. सामंत ने ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज संस्था की ओर से गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की समस्या पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि केवल एनीमिया की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं है , बल्कि इलाज शुरू होने के बाद महिला की स्थिति पर लगातार नजर रखना और जरूरत के अनुसार उपचार में बदलाव करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और उपचार को बेहतर बनाने की जरूरत बताई, इससे एनीमिया के गंभीर होने से पहले ही उचित कदम उठाए जा सकें। इसके साथ ही उन्होंने गर्भवती महिलाओं को दिए जाने वाले इंट्रावेनस फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ इंजेक्शन की विशेषता बताते हुए कहा कि इससे एक ही बार में शरीर में जरूरी आयरन की पूरी मात्रा दी जा सकती है, जिससे बार-बार अस्पताल आने की जरूरत कम हो जाती है। इसके माध्यम से शरीर में आयरन को धीरे-धीरे और सुरक्षित तरीके से पहुंचाने में मदद मिलती है, जिससे आयरन की कमी को शीघ्र पूरा करने में सहायता मिलती है।

राधा देवी जागेश्वरी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुजफ्फरपुर की प्राचार्य प्रो. (डॉ.) आभा रानी सिन्हा ने कहा कि मातृ एनीमिया केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौती भी है। उन्होंने गर्भवती महिलाओं की समय पर जाँच , एनीमिया की पहचान और जरूरत के अनुसार उपचार शुरू करने पर जोर दिया। उन्होनें बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 तक के आंकड़ों के अनुसार बिहार में एनीमिया का बोझ बढ़ा है। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की व्यापकता 58.3% से बढ़कर 63.1% हो गई, अर्थात 4.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी प्रकार, प्रजनन आयु वर्ग की सभी महिलाओं में एनीमिया 60.3% से बढ़कर 63.5% हो गया, यानी 3.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बिहार में मातृ एवं प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया अभी भी एक गंभीर और बढ़ती हुई जनस्वास्थ्य चुनौती है।

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