दरभंगा , मई 04 -- सुप्रसिद्ध दलित लेखिका, कवयित्री एवं आलोचक अनीता भारती ने कहा कि सभी स्त्रियाँ एकसमान नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच भी जातीय स्तरीकरण मौजूद है।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के तत्वावधान में सोमवार को 'दोहरी चुनौती और दोहरा संघर्ष : दलित स्त्रीवादी साहित्य के विविध आयाम' विषय पर आयोजित एकल व्याख्यान को संबोधित करते हुए श्रीमती भारती ने कहा कि दलित स्त्रीवाद की जड़ें आधुनिक स्त्री आंदोलन से भी पहले बौद्ध काल तक जाती हैं। उन्होंने कहा कि गौतम बुद्ध ने जातीय भेदभाव को अस्वीकार करते हुए संघ में सभी वर्गों की स्त्रियों को प्रवेश दिया, जिनमें दलित वर्ग की स्त्रियाँ भी शामिल थीं। इन स्त्रियों की रचना कर्म को 'थेरी गाथा' के रूप में जाना जाता है, जिसमें दलित स्त्री मन की संवेदनशील अभिव्यक्ति मिलती है।उन्होंने स्पष्ट किया कि दलित स्त्रीवादी साहित्य को केवल दलित लेखन या स्त्री लेखन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके केंद्र में दलित स्त्रीवाद की स्वतंत्र वैचारिकी है।

श्रीमती भारती ने मध्यकालीन संत परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि कई संत कवयित्रियों ने वंचित वर्ग की स्त्रियों की पीड़ा और मुक्ति को स्वर दिया। आधुनिक काल में फुले दंपति, डॉ. आंबेडकर,रमाबाई और पेरियार जैसे सामाजिक चिंतकों के आंदोलनों और विचारों ने दलित स्त्रीवाद को वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा का स्त्रीवाद जहाँ केवल पितृसत्ता के साथ-साथ जाती सट्टा एवं धर्म सत्ता से भी संघर्ष करता है, वहीं दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के साथ-साथ जाति और धर्म आधारित सत्ता संरचनाओं से भी मुकाबला करता है।

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