अजमेर , मई 01 -- राजस्थान के अजमेर में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में शुक्रवार एक महत्वपूर्ण और सार्थक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें अजमेर संभाग के टोंक जिले के सम्बद्ध महाविद्यालयों के प्राचार्यों ने भाग लिया।

इस अवसर पर कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि यह संवाद केवल औपचारिक बैठक न होकर विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के बीच आपसी समझ, विश्वास और सहभागिता को सुदृढ़ करने का एक सशक्त प्रयास बनकर उभरा। प्रो अग्रवाल ने "मैं और आप" की भावना को समाप्त कर "हम" की सोच विकसित करने पर जोर देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय किसी एक व्यक्ति या संस्था से नहीं बल्कि सभी के सामूहिक प्रयास से चलता है। यदि सभी हितधारक मिलकर कार्य करें, तो न केवल समस्याओं का समाधान सरल हो जाता है बल्कि संस्थान की प्रतिष्ठा भी निरंतर बढ़ती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय की अपेक्षाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है और विश्वविद्यालय भी अपने स्तर पर महाविद्यालयों की उचित अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। कुलगुरु ने वर्तमान समय में शिक्षा के बदलते स्वरूप पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज की चर्चाएं केवल परीक्षा संचालन और परीक्षा केन्द्रों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हमें शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गहन मंथन करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज का विद्यार्थी तकनीक के माध्यम से बहुत कुछ स्वयं प्राप्त कर सकता है, ऐसे में शिक्षकों को अपनी भूमिका को अधिक सृजनात्मक और विश्लेषणात्मक बनाना होगा। यदि कक्षा में उपस्थिति को सार्थक बनाना है, तो शिक्षण को ऐसा बनाना होगा जो केवल जानकारी न देकर सोचने की क्षमता विकसित करे।

श्री अग्रवाल ने कहा कि जब शिक्षा को विद्यार्थियों के परिवेश और संस्कृति से जोड़ा जाता है, तो उसका प्रभाव अत्यंत सकारात्मक होता है। उदयपुर के आदिवासी क्षेत्र में "गवरी नृत्य" के माध्यम से अंग्रेजी शिक्षण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रयोग विद्यार्थियों में उत्साह, उपस्थिति और सीखने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देते हैं।

उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़ी शिक्षण पद्धतियों को अपनाएं, क्योंकि जो राष्ट्र अपनी शिक्षा को अपनी संस्कृति से जोड़ता है वही वास्तविक प्रगति करता है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय शीघ्र ही पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों को शामिल करेगा।

कार्यक्रम कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने इस पहल को एक अभिनव प्रयास बताते हुए कहा कि इस प्रकार का प्रत्यक्ष संवाद पहले कभी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि संवाद की कमी ही कई बार समस्याओं और भ्रम का कारण बनती है, और जब हम आमने-सामने बैठकर चर्चा करते हैं तो समाधान अधिक स्पष्ट और प्रभावी रूप में सामने आते हैं।

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