नयी दिल्ली , फरवरी 24 -- केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सारस्वत सभागार में सोमवार को 'केंद्रीय शोध मंडल' (सेंट्रल रिसर्च बोर्ड) की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने की। बैठक का मुख्य उद्देश्य संस्कृत शोध की गुणवत्ता को बेहतर बनाना, भारतीय ज्ञान परंपरा का विस्तार करना और शोध कार्यों को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करने का लक्ष्य है।

बैठक में देश के प्रतिष्ठित तकनीकी और शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों ने बाह्य सदस्यों के रूप में भाग लिया। कुलपति प्रो. वरखेड़ी ने सभी विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कहा कि अंतःविषयक सहयोग से संस्कृत अध्ययन को नई दिशा मिलेगी और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धतियों से जोड़ा जा सकेगा।

बैठक में शामिल प्रमुख विद्वानों में प्रो. रिचा चोपड़ा (आईआईटी खड़गपुर), प्रो. मोहन राघवन (आईआईटी हैदराबाद), प्रो. ओमनाथ बिमली (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. सम्पदानन्द मिश्र (ऋषिहुड विश्वविद्यालय) और प्रो. राकेश दास (रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान) शामिल रहे।

प्रो. गणेश टी. पंडित ने बताया कि बैठक में विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और संरचनात्मक ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। मंडल ने सर्वसम्मति से 199 नए शोध प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान की, जबकि 633 शोधार्थियों की प्रगति रिपोर्ट की विस्तृत समीक्षा भी की गई।

बैठक में भारतीय ज्ञान परंपरा के विस्तार के लिए 'सेतुबन्ध योजना' पर विशेष चर्चा हुई। इस योजना के माध्यम से संस्कृत के अतिरिक्त अन्य विषयों के विद्वानों को भी भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ा जाएगा। योजना के अंतर्गत चयनित 54 अभ्यर्थियों और अंतरराष्ट्रीय शोधार्थियों के शोध कार्यों की समीक्षा की गई।

शोध गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से "शोध संगम" कार्यशाला आयोजित करने और नए शोध-मार्गदर्शकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम को भी स्वीकृति दी गई। साथ ही देशभर में विश्वविद्यालय के 20 शोध केंद्रों के उन्नयन को लेकर व्यापक नीतिगत विमर्श हुआ, ताकि शोध गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

बैठक में यह विश्वास व्यक्त किया गया कि आईआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों के साथ सहयोग से संस्कृत शोध को नई गति मिलेगी और भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान प्राप्त होगी।

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