वाराणसी , सितंबर 11 -- उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं संस्कृत-भारतीय संस्कृति के समर्थक डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने कहा कि संस्कृत के विशाल वाङ्मय में निहित ज्ञान को शोध, अनुवाद, आधुनिक तकनीक और व्यापक जनसहभागिता के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। संस्कृत के ज्ञान-विस्तार से भारतीय ज्ञान-परम्परा और अधिक सुदृढ़ होगी।
डॉ. निशंक ने यह बात शुक्रवार को यहां सर्किट हाउस में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा से भेंट के दौरान कही। इस अवसर पर संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन, शोध, अनुवाद और वैश्विक प्रसार सहित उसे जनजीवन से जोड़ने के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कुलपति ने पुष्पगुच्छ भेंट कर डॉ. निशंक का स्वागत किया तथा विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'लोक विद्या विमर्श' और 'लोकमता गंगा' की प्रतियां भेंट कीं। वार्ता में संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, पुनर्पाठ और उनके ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में उपयोगी बनाने के साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद पर विशेष बल दिया गया।
प्रो. शर्मा ने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-संपदा, दर्शन, विज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की जीवंत संवाहक है। उन्होंने कहा कि संस्कृत, संस्कृति और भारतीय ज्ञान-परम्परा को लोकजीवन, युवा पीढ़ी, आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक तथा वैश्विक अकादमिक विमर्श से जोड़कर समग्र कार्य-मानचित्र तैयार किया जाएगा। चर्चा को शीघ्र ही ठोस कार्ययोजना में परिणत करने का प्रयास होगा।
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