देहरादून , सितम्बर 27 -- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को कहा कि कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं पर भ्रम फैलाने के बजाय तथ्यों पर बात करें।

श्री धामी ने आज अपने आवास स्थित मुख्य सेवक सदन में आनन फानन आयोजित संवाददाता सम्मेलन में पहली बार विपक्षी कांग्रेस और उसके आरोपों पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के मजबूत लोकतंत्र का आधार देश की संवैधानिक संस्थाएं हैं और चुनाव आयोग भी देश की स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।

उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक कमजोरियों पर आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक एवं संवैधानिक विषयों को राजनीतिक ढाल बनाकर जनता के बीच भ्रम पैदा करने से कांग्रेस की समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

श्री धामी ने कहा कि आज की पीढ़ी जागरूक है और वह तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय करना जानती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता श्री राहुल गांधी ने देहरादून में दावा किया कि भाजपा सरकार ने नकल के मामलों में किसी माफिया को जेल नहीं भेजा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में नकल माफिया के खिलाफ लगातार कार्रवाई की गई है और सरकार के अनुसार 100 से अधिक आरोपियों को जेल भेजा गया है।

उन्होंने कहा कि भर्ती परीक्षाओं की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में सख्त नकल विरोधी कानून लागू किया गया है। पिछले पांच वर्षों में 35 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गई हैं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सरकार की प्राथमिकता रही है। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक आरोप लगाने से पहले तथ्यों को देखना चाहिए। केवल आरोप लगाने से जमीनी सच्चाई नहीं बदलती।

मुख्यमंत्री ने हल्द्वानी प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी घटना को जातीय दृष्टिकोण से देखने से पहले उससे जुड़े तथ्यों की जांच आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान सामाजिक समरसता, भाईचारे और सभी वर्गों के परस्पर सम्मान की रही है। जिसे जाति और वर्ग के आधार पर बांटने की राजनीति नहीं होनी चाहिए। देवभूमि की सामाजिक एकता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और इसे बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने जमीन से जुड़े कांग्रेस के आरोपों पर कहा कि यदि विपक्ष के पास सरकार अथवा किसी सरकारी संस्था द्वारा नियमों के विरुद्ध जमीन बेचे जाने या दिए जाने का कोई प्रमाण है तो उसे सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने कहा कि केवल किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह तथ्य नहीं बन जाता। विपक्ष तथ्य सामने रखे, सरकार प्रत्येक तथ्यात्मक सवाल का जवाब देने के लिए तैयार है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी की पूर्ण आयोग की बैठक हुई। बैठक के बाद जारी नोट को पूरे आयोग की स्वीकृति प्राप्त है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि 24 जून 2025 को जारी एसआइआर का मूल आदेश पूरे आयोग की सर्वसम्मति से जारी हुआ था। इसके बाद 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तथा फिर 19 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की एसआइआर समय-सारिणी को भी आयोग की सर्वसम्मति से स्वीकृति दी गई। ऐसे में किसी आंतरिक टिप्पणी को आयोग के अंतिम निर्णय में मतभेद के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि एक समाचार पत्र की रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा विभिन्न विषयों पर कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज करने की बात कही गई है, लेकिन आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि एसआइआर से जुड़े अंतिम आदेश सर्वसम्मति से लिए गए। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई 2026 के निर्णय में एसआईआर करने की चुनाव आयोग की वैधानिक शक्ति को स्वीकार किया और बिहार में अपनाई गई इस प्रक्रिया को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम तथा संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुरूप माना। उन्होंने कहा कि आयोग ने कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्र को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है।

आयोग के अनुसार वह पत्र प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी की कार्यप्रणाली से जुड़ा प्रशासनिक विषय था। उन्होंने आगे कहा कि छूटे हुए तथा पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की बात भी आयोग ने कही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में प्रश्न अवश्य पूछे जाने चाहिए, लेकिन किसी इंटरनल नोट को अंतिम फैसला और किसी ऑब्जेक्शन को इंस्टीट्यूशनल ब्रेकडाउन के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। तथ्य हेडलाइन से नहीं, पूरी फाइल और अंतिम संस्थागत निर्णय से तय होने चाहिए।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत माता से जुड़े हालिया राजनीतिक विवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को लेकर की गई टिप्पणी तथा देश के प्रथम सीडीएस जनरल बिपिन रावत से जुड़े राजनीतिक बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक असहमति अपनी जगह है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तियों और दिवंगत लोगों को लेकर राजनीतिक विमर्श में सम्मान और संवेदनशीलता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

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