भोपाल , जून 14 -- मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि "संभावना" के अंतर्गत रविवार को बैगा जनजातीय करमा नृत्य और कछियाई नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियां दी गईं।
संग्रहालय में आयोजित कार्यक्रम में डिण्डोरी के दयाराम राठुरिया एवं उनके साथियों ने बैगा जनजातीय करमा नृत्य प्रस्तुत किया, जबकि सिरोंज के हरिसिंह केवट एवं साथियों ने बुंदेलखंड की पारंपरिक लोकनृत्य शैली कछियाई नृत्य का प्रदर्शन किया।
कछियाई नृत्य बुंदेलखंड अंचल की पारंपरिक लोकनृत्य एवं संगीत शैली है, जिसे मुख्य रूप से काछी समुदाय द्वारा मांगलिक अवसरों और त्योहारों पर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें भक्ति और श्रृंगार रस की प्रधानता रहती है। इस शैली में ढोलक, सारंगी और खंजरी प्रमुख वाद्ययंत्र हैं तथा गीतों में देवी-देवताओं की स्तुति और जनजीवन से जुड़े प्रसंगों का समावेश होता है।
बैगा जनजाति का करमा नृत्य उनके प्रमुख लोकनृत्यों में शामिल है। इस नृत्य में बैगा समुदाय अपने कर्म और जीवन से जुड़े भावों को गीत और नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। विजयदशमी से वर्षा ऋतु के प्रारंभ तक किए जाने वाले इस नृत्य में पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हैं, जबकि महिलाएं गोल घेरे में घूम-घूमकर गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। इसमें स्त्री और पुरुष दोनों सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
जनजातीय संग्रहालय के अनुसार प्रत्येक रविवार दोपहर दो बजे आयोजित होने वाली "संभावना" गतिविधि के माध्यम से मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों और सात प्रमुख जनजातियों की विविध कला परंपराओं के साथ देश के अन्य राज्यों की लोक एवं जनजातीय कलाओं को भी जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
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