जयपुर , जनवरी 19 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने साइबर अपराधों की जांच के दौरान आम नागरिकों के बैंक खाते फ्रीज करने की पुलिस कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता फ्रीज करना न तो कानूनी है और न ही संविधान सम्मत है।
न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की पीठ ने सोमवार को आदेश दिया कि साइबर अपराध के मामलों में पुलिस को बैंक खाता फ्रीज करने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। न्यायालय ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 106 के तहत पुलिस को केवल सीमित जब्ती का अधिकार है, जबकि धारा 107 के तहत खाता जब्ती, खाते पर रोक पूर्ण खाता फ्रीज करने का अधिकार केवल मजिस्ट्रेट को प्राप्त है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी खाते में केवल एक निश्चित राशि संदिग्ध है, तो पूरे खाते को फ्रीज करना अनुचित और असंगत है। ऐसी स्थिति में केवल विवादित राशि ही फ्रीज किया जाना चाहिए। न्यायालय ने इसे "ब्लैंकेट फ्रीजिंग" की प्रवृत्ति को नागरिकों की आजीविका और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया।
फैसले में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई), बैंकों और भुगतान संस्थानों की भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा गया कि पुलिस को राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) के माध्यम से ही जांच करनी चाहिए।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि साइबर अपराध रोकने के नाम पर निर्दोषों का उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं है और राज्य की शक्ति का प्रयोग नागरिक अधिकारों के साथ संतुलन बनाकर ही किया जाना चाहिए।
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