रांची , अप्रैल 01 -- झारखंड के रांची स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) परिसर में आज एक भव्य जन गोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों-शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, मीडिया एवं सामाजिक जीवन-से जुड़े बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन सम्मिलित हुए।
कार्यक्रम का प्रारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसके पश्चात अतिथियों का स्वागत एवं परिचय कराया गया। प्रारंभिक संबोधन में राजीव कमल बिट्टू, प्रांत संपर्क प्रमुख ने इस गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना समय की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्र निर्माण में सभी की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
अपने उद्बोधन में श्री आंबेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की यात्रा, उसकी कार्यपद्धति, विचारधारा एवं समाज में उसकी भूमिका पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्ष 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर एक छोटे से प्रयास के रूप में प्रारंभ हुआ संघ आज एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में विकसित हो चुका है।
उन्होंने बताया कि संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के साथ ही पूरे देश में उसके कार्य और विचार को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। पहले जहाँ संघ के बारे में जानकारी सीमित दायरे में ही रहती थी, वहीं आज समाज का सामान्य नागरिक भी संघ के सकारात्मक पक्ष को जानने और समझने के लिए उत्सुक है। उन्होंने कहा कि देशभर में आयोजित हो रहे ऐसे कार्यक्रमों में विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं और संघ के विचार को प्रत्यक्ष रूप से समझने का प्रयास कर रहे हैं।
श्री आंबेकर ने कहा कि संघ केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि यह एक अनुभूति का विषय है। उन्होंने वर्तमान सरसंघचालक के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त करना कठिन है, इसे अनुभव के माध्यम से ही समझा जा सकता है। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन और उनके राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत व्यक्तित्व का विस्तृत वर्णन किया।
श्री आंबेकर ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी जन्म से ही राष्ट्र के प्रति समर्पित थे। बाल्यकाल से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। उन्होंने अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय समाज और संस्कृति पर पड़े प्रभाव को निकट से देखा और अनुभव किया, जिससे उनके मन में राष्ट्र के पुनर्निर्माण का संकल्प जागृत हुआ।
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