श्रीनगर , अक्टूबर 23 -- जम्मू कश्मीर मे श्रीनगर के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने 2013 में रामबन में सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक इंजीनियर के परिवार को 58.50 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में कहा कि इंजीनियर के कानूनी उत्तराधिकारी मुआवजा पाने के हकदार हैं, भले ही वह उस समय अपना ही बीमाकृत वाहन चला रहे थे।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश और एमएसीटी के पीठासीन अधिकारी फैयाज अहमद कुरैशी ने 21 अक्टूबर को अपने फैसले में ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 58,50,282 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, पांच मई 2015 (जिस तारीख को मुआवजे की याचिका दायर की गयी) से लेकर पूरी रकम मिलने तक, नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देने का निर्देश दिया।

न्यायाधिकरण ने आगे निर्देश दिया कि अगर 30 दिनों के भीतर मुआवजा नहीं दिया गया तो उसके बाद बकाया राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज लगेगा।

यह मामला 41 वर्षीय इंजीनियर सैयद जावेद नज़ीर से जुड़ा है, जो बगलीहार जलविद्युत परियोजना से जुड़े थे। तीस जुलाई 2013 को रामबन जिले में नगर-चंदरकोट राजमार्ग पर डिगडोल के पास नजीर की कार के एक गहरी खाई में गिर जाने से उनकी मौत हो गयी। इसके बाद उनकी पत्नी, दो नाबालिग बेटियों और माता-पिता ने मुआवजे की मांग करते हुए न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। परिवार ने शुरुआत में 53 लाख रुपये का दावा किया था जिसमें वाहन के नुकसान के लिए तीन लाख रुपये भी शामिल थे।

न्यायाधिकरण के सामने एक मुख्य सवाल यह था कि क्या मृतक का परिवार मुआवजे का दावा कर सकता है जबकि मृतक खुद ही उस बीमित कार का मालिक था और उसे चला रहा था। बीमा कंपनी ने इस दावे का विरोध किया और दायित्व तथा मोटर वाहन अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के लागू होने को लेकर आपत्तियां उठायी।

बीमा कंपनी की आपत्ति को खारिज करते हुए न्यायाधिकरण ने साक्ष्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों की जांच के बाद यह पाया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत दावा स्वीकार किये जाने योग्य है।

न्यायाधिकरण ने पाया कि वाहन अनियंत्रित होकर खाई में गिर गयी थी और सबूतों से यह साबित नहीं हुआ कि मृतक की ओर से कोई लापरवाही बरती गयी थी। उसने यह भी पाया कि कार का बीमा था और दुर्घटना के समय मृतक के पास एक वैध ड्राइविंग लाइसेंस था।

फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मोटर दुर्घटनाओं से जुड़े मुआवजे के दावों का आकलन कानून और उचित मुआवजे के सिद्धांत के अनुसार किया जाना चाहिए, न कि बीमाकृत वाहन मालिक और बीमा कंपनी के बीच के संबंध की किसी संकीर्ण तकनीकी व्याख्या के आधार पर उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए।

न्यायाधिकरण ने इंजीनियर की आय और आश्रय के नुकसान के लिए परिवार को मिलने वाले मुआवजे पर भी विचार किया। अंतिम फैसले में, कुल मुआवजे में से व्यक्तिगत दुर्घचना कवर के तहत मिलने वाले दो लाख रुपये की राशि को घटाकर समायोजित किया गया है।

मई 2015 में दायर किए गए इस दावे का फैसला इसे दाखिल करने के 11 साल से भी अधिक समय बाद और उस जानलेवा दुर्घटना के 13 साल से भी अधिक समय बाद आया। फैसले में ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया गया कि वह निर्धारित 30 दिनों की अवधि के भीतर भुगतान आदेश का पालन करे।

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