नयी दिल्ली , मई 25 -- प्रसिद्ध कवि, आलोचक, कला-मर्मज्ञ एवं रजा फाउंडेशन के ट्रस्टी अशोक वाजपेयी ने 'मगध' जैसी क्लासिक कृति के कवि श्रीकांत वर्मा को उनकी 40वीं पुण्यतिथि के अवसर पर याद करते हुए उन्हें हिंदी का एक नाराज कवि बताया और कहा कि उन्होंने अपनी वैचारिकता और तेवर से समझौता कभी नहीं किया।
श्री वाजपेयी ने सोमवार को यहां कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित 'विश्व हिंदी परिषद' एवं 'श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट' द्वारा 'श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि' में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री वाजपेयी ने श्रीकांत वर्मा के साथ बिताए समय और उनसे जुड़ी अविस्मरणीय साहित्यिक यादों को जीवंत किया। उन्होंने कहा " श्रीकांत वर्मा एक लड़ाकू कवि थे। किसी भी सभा में वे अपने वैचारिक और कविता के तेवर को स्थगित नहीं करते थे। वे जो कहना चाहते थे, कह देते थे। वो हिंदी के पहले सबसे नाराज कवि थे। वे अपने नरक में अकेले थे। वे 20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे।"कला समीक्षक श्री विनोद भारद्वाज ने कहा कि श्रीकांत वर्मा के तेवर अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिलकुल अलग थे। उन्होंने श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरणों को साझा करते हुए कहा कि दुनिया बदल जाती है लेकिन स्मृतियां रह जाती हैं।
जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी ने 'श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर' विषय पर केंद्रित व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने श्रीकांत वर्मा की वैचारिक प्रखरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा " श्रीकांत जी बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। मैं जब दिनमान की पत्रकारिता को याद करता हूं, तो वे बहुत याद आते हैं। वे पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे। "कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने श्रीकांत वर्मा से अपनी मुलाकातों को याद किया और साहित्य तथा पत्रकारिता के अंतर्संबंधों को उजागर करते हुए 'पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा' विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि समाज में जो हो रहा है, उसे जानने का माध्यम पत्रकारिता है।
प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने 'कथा एवं साहित्य' विषय पर अकादमिक और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी के साथ और संवेदना के साथ अपनी बात कहना बड़ा कठिन होता है। श्रीकांत वर्मा के गद्य में उनकी सहृदयता परिलक्षित होती है। उनके साहित्य में युगबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की कुंठा को चित्रित किया है। उनका लेखन बहुत अनुशासित है।
एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार अदिति राजपूत ने समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा पर प्रकाश डालते हुए 'वर्तमान पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा' विषय पर महत्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा" श्रीकांत वर्मा ने हमें बताया कि पत्रकारिता एक उद्योग नहीं है, यह लोक चेतना है।
श्रीकांत वर्मा के सुपुत्र डॉ. अभिषेक वर्मा ने अपने पिता से जुड़ी स्मृतियों तथा 'श्रीकांत वर्मा सम्मान' की जानकारी साझा की। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले पांच पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में दिए जाएंगे। इसमें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक राशि का सम्मान है।
इस अवसर पर डॉ. वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्रीकांत वर्मा की पुस्तक 'मगध' और मोती माला भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
इस दौरान साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने श्रीकांत वर्मा के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी वैचारिक विरासत पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालक डॉ. हर्षबाला द्वारा किया गया।
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