नयी दिल्ली , अप्रैल 17 -- सेना के शीर्ष कमांडरों के सम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे सैन्य संघर्षों और ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों के आधार पर सेना को हर तरह से सशक्त बनाने तथा उसकी जरूरतों को देश में ही पूरा करने के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर बल दिया गया।
सैन्य नेतृत्व ने मानव रहित हवाई प्रणालियों और ड्रोन रोधी प्रणालियों के उपयोग सहित संचालन क्षमता बढाने की जरूरत पर भी जोर दिया ।
रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को वक्तव्य जारी कर कहा कि सेना के कमांडरों के 13 अप्रैल से शुरू हुए चार दिन के सम्मेलन की अध्यक्षता सेना प्रमुख ने की और इसमें शीर्ष सैन्य नेतृत्व ने भाग लिया। सम्मेलन को कैबिनेट सचिव, प्रमुख रक्षा अध्यक्ष, रक्षा सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष तथा नौसेना प्रमुख सहित सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने संबोधित किया।
'भविष्य के लिए तैयार बल' बनने के दृष्टिकोण के अनुरूप, सेना ने वर्ष 2026 को "नेटवर्किंग और डेटा केंद्रितता" का वर्ष घोषित किया है। सम्मेलन में आधुनिकीकरण, युद्ध अभियानों में प्रौद्योगिकी के समावेशन, सिद्धांत और प्रशिक्षण आवश्यकताओं के साथ-साथ नेटवर्किंग और डेटा केंद्रितता से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गई, ताकि परिचालन तत्परता को बढ़ाया जा सके और उभरती सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया जा सके। ऑपरेशन सिंदूर से प्राप्त अनुभवों के आधार पर तथा वर्तमान वैश्विक परिचालन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व ने मानव रहित हवाई प्रणालियों और उनके प्रतिरोधी प्रणालियों के उपयोग सहित परिचालन क्षमता आवश्यकताओं पर भी ध्यान केंद्रित किया।
विशिष्ट वक्ताओं ने बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और उभरती वैश्विक, क्षेत्रीय तथा आंतरिक सुरक्षा गतिशीलताओं पर प्रकाश डाला। वैश्विक संघर्षों से प्राप्त अनुभवों के संदर्भ में, वक्ताओं ने भारत के रणनीतिक और सुरक्षा हितों की सुनिश्चित रक्षा के लिए सशक्त शक्ति की आवश्यकता पर जोर दिया, साथ ही अंतर-मंत्रालयी समन्वय, नागरिक और सैन्य संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल तथा जटिल सुरक्षा चुनौतियों के लिए समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के लिए संपूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण पर बल दिया। चर्चाओं के दौरान मौजूदा आपूर्ति श्रृंखला संकट को देखते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और दीर्घकालिक रणनीतिक सुदृढ़ता सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी उत्पादन क्षमताओं को तेज़ी से बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया गया।
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