नयी दिल्ली , जुलाई 21 -- शिवसेना (यूबीटी) ने अपने छह लोकसभा सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता देने के लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले को मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी और न्यायालय से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि संविधान की मूल संरचना का हिस्सा लोकतंत्र को बचाना आवश्यक है।
वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष अनुरोध किया कि याचिका को बुधवार या शुक्रवार को शीघ्र सूचीबद्ध किया जाये। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे।
मुख्य न्यायाधीश ने शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता पूछी तो श्री कामत ने कहा, "स्थिति अत्यंत गंभीर है। संसद में एक राजनीतिक दल के रूप में हमारी कार्यप्रणाली पूरी तरह ठप हो गयी है। ये सांसद अब हमारे साथ नहीं हैं, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ने उनके दूसरे राजनीतिक दल में विलय को मान्यता दे दी है। यह मामला संसद के मौजूदा सत्र से जुड़ा है।"इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "कल या शुक्रवार को सुनवाई का आश्वासन नहीं दे सकते। हम इस पर विचार करेंगे।"उल्लेखनीय है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र की शुरुआत से दो दिन पहले, 18 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी थी। श्री शिंदे की पार्टी में शामिल होने वाले सांसदों में संजय जाधव, संजय पाटिल, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, नागेश पाटिल आष्टीकर और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि ये छहों सांसद 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) के उम्मीदवार के रूप में पार्टी के चुनाव चिह्न 'मशाल' पर निर्वाचित हुए थे। पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया था और उनके चुनाव के लिए संगठन, कार्यकर्ताओं तथा नेतृत्व ने व्यापक प्रयास और संसाधन लगाये थे।
याचिका में कहा गया है कि मतदाताओं ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व, उनकी विचारधारा तथा एकनाथ शिंदे गुट के विरुद्ध शिवसेना (यूबीटी) के अभियान का समर्थन करते हुए इन उम्मीदवारों को चुना था।
पार्टी का कहना है कि 2024 का लोकसभा चुनाव अन्य मुद्दों के साथ-साथ बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत को कथित असंवैधानिक दलबदल के माध्यम से हड़पे जाने के मुद्दे पर भी लड़ा गया था और मतदाताओं ने पार्टी के रुख का समर्थन किया था।
याचिका में लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय को "संवैधानिक आत्मघात" बताया गया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि छहों सांसदों ने मतदाताओं द्वारा उन पर जताये गये विश्वास के साथ विश्वासघात किया है और मूल राजनीतिक दल की इच्छा के विरुद्ध उनका आचरण न तो संवैधानिक है और न ही कानूनी।
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