नयी दिल्ली , मई 15 -- उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के चुनाव चिह्न मामले की सुनवाई की। कई बार स्थगित होने के बाद हुई इस सुनवाई के दौरान अदालत ने उद्धव गुट के वकील को सख्त निर्देश दिया कि वे अपने मुवक्किल (उद्धव ठाकरे) को मीडिया में बयानबाजी करने से रोकें।
यह सुनवाई उद्धव गुट की उस याचिका पर हुई, जिसमें पिछले तीन वर्षों से मामला लंबित होने के कारण जल्द सुनवाई की मांग की गयी थी।
शिवसेना के दो गुटों में बंटने के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना माना था। आयोग ने अविभाजित शिवसेना का 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न भी शिंदे गुट को आवंटित कर दिया था और उन्हें 'शिवसेना' नाम इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी। इस फैसले के तुरंत बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने उच्चम न्यायालय का रुख किया था।
आज की सुनवाई के दौरान उद्धव गुट के वकील देवदत्त कामत ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से इस मामले को जल्द से जल्द निपटाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वे पिछले तीन वर्षों से इंतजार कर रहे हैं, इसलिए न्यायालय को इस पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।
इस अनुरोध पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "सबसे पहले आप अपने मुवक्किल को मीडिया में जाकर यह गैर-जिम्मेदाराना बयान देने से रोकें कि 'उच्चतम न्यायालय फैसला नहीं दे रहा है'। आप यहां अनुरोध करते हैं और बाहर जाकर ऐसी बातें कही जाती हैं। हम आपको चेतावनी दे रहे हैं कि अपने शब्दों का चयन सावधानी से करें। ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।"अधिवक्ता कामत ने कहा कि वकील ऐसे बयानों का समर्थन नहीं करते तो मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, "हम यहां शाम चार बजे तक बैठते हैं और लगातार काम कर रहे हैं। जब मामला लिस्ट होता है, तो आप तारीख मांगते हैं और फिर मीडिया में जाकर इस तरह की टिप्पणी करते हैं। मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा, सावधान रहें।"सरकारी वकील मुकुल रोहतगी ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि किसी भी पक्ष को अदालत के बारे में ऐसी बातें कहने का अधिकार नहीं है। उन्होंने मामले की अगली सुनवाई जुलाई के अंतिम सप्ताह में रखने का सुझाव दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने अंततः घोषणा की कि मामले की अगली सुनवाई गर्मियों की छुट्टियों के बाद 30 जुलाई को होगी।
उद्धव गुट के एक अन्य वकील असीम सरोदे ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि संवैधानिक दृष्टिकोण से निर्णय लिया गया तो यह उद्धव ठाकरे के पक्ष में होगा। उन्होंने दावा किया कि यदि अदालत शिंदे गुट से नाम और चिह्न वापस लेता है तो एकनाथ शिंदे 'राजनीतिक रूप से अनाथ' हो जायेंगे और उनके पास भाजपा में शामिल होने या नयी पार्टी बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
अधिवक्ता असीम सरोदे ने यह भी कहा कि भले ही विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने पहले के आदेशों को सही ढंग से लागू न किया हो, लेकिन उच्चतम न्यायालय का अंतिम फैसला महाराष्ट्र के पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल कर रख देगा।
फिलहाल 30 जुलाई की तारीख इस लंबी कानूनी लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है।
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