बेंगलुरु , अक्टूबर 26 -- कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने चीनी मिल मालिकों से गन्ना किसानों के साथ आपसी सहमति से रास्ता निकालने और समझौता करने की अपील की है।
श्री शिवकुमार ने चीनी मिल मालिकों के साथ एक बैठक में कहा कि इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी मिलों, राज्य सरकार और केंद्र सरकार तीनों की है। उन्होंने एक ऐसा समाधान निकालने पर जोर दिया जो किसानों और चीनी उद्योग दोनों के हितों की रक्षा करे। उन्होंने कहा, "भले ही इससे आप पर कुछ बोझ पड़े लेकिन ऐसा फैसला लें जिससे कोई समाधान निकल सके। किसानों के साथ चर्चा करें, उनके प्रति उदारता दिखाएं और मिलकर कोई निर्णय लें।"मुख्यमंत्री ने बताया कि किसानों ने 6,000 रुपये प्रति टन तक की कीमत मांगी है। इस मुद्दे को केवल राज्य सरकार अकेले नहीं सुलझा सकती क्योंकि चीनी मिलों के सामने कई चुनौतियां हैं-जैसे आर्थिक तंगी, बैंकिंग से जुड़ी समस्याएं, इथेनॉल और शीरे (मोलासेस) से जुड़े मुद्दे और बिजली की लागत।
श्री शिवकुमार ने कहा, "हम किसी एक पक्ष के साथ नहीं हैं। अगर चीनी मिलें नहीं होंगी, तो किसानों को नुकसान होगा और अगर किसान नहीं होंगे, तो मिलों को दिक्कतें आएंगी। हमें दोनों के हितों की रक्षा करनी है।"उन्होंने शांति बनाए रखने पर जोर देते हुए पिछले साल हुए उस आंदोलन का जिक्र किया जिसमें वाहनों में आग लगा दी गई थी। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि चीनी मिल मालिक किसानों का भरोसा जीतने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने मिल मालिकों से अपील की कि किसानों का गुस्सा और बढ़ने से पहले ही उनकी शिकायतों का समाधान करें। मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने जिला मंत्रियों और विधायकों ने कित्तूर में प्रदर्शन कर रहे किसानों से मुलाकात की और उनकी समस्याएं सुनीं। उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करने के लिए समय मांगा है क्योंकि इस विवाद में जटिल आर्थिक और उद्योग से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा, "आज पूरी सरकार आपके सामने आकर बैठी है। यह कोई राजनीतिक बैठक नहीं है, उसके लिए दूसरे मंच मौजूद हैं। हमें आपसी समझ से इसका समाधान निकालना होगा।"श्री शिवकुमार ने याद दिलाया कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पहले यह तय किया था कि किसानों द्वारा मांगी गई वित्तीय सहायता का एक हिस्सा सरकार देगी, जबकि बाकी हिस्सा चीनी मिलें देंगी। उन्होंने बताया कि अधिकारियों के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत मिलों ने इस व्यवस्था को लागू कर दिया है, जबकि कुछ मिलों ने ऐसा नहीं किया और वे अदालत चली गईं।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं है, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों को भी ऐसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार को इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर देखने की जरूरत है, खासकर इथेनॉल और शीरे (मोलासेस) से जुड़ी नीतियों और चीनी उद्योग के सामने आ रही व्यापक कठिनाइयों के संदर्भ में।
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