कोलकाता , जुलाई 19 -- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को यहां राष्ट्रीय पुस्तकालय में भारतीय भाषाओं को समर्पित देश के पहले संग्रहालय 'शब्दलोक' का उद्घाटन किया।

आधिकारिक तौर पर 'म्यूजियम ऑफ वर्ड्स' यानी 'शब्दों का संग्रहालय' नाम वाले इस संग्रहालय को राष्ट्रीय पुस्तकालय परिसर में लगभग 41 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है। इस परियोजना को भारतीय भाषाओं के विकास और देश की सांस्कृतिक और सभ्यतागत यात्रा में उनके योगदान को प्रदर्शित करने के लिए तैयार किया गया है।

उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, संस्कृति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।

इस मौके पर केंद्रीय गृहमंत्री ने भाषा को सभ्यता की नींव बताते हुए कहा, "मनुष्य भाषा नहीं बनाता, भाषा मनुष्य को बनाती है। भाषा के बिना किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अस्तित्व नहीं हो सकता।"श्री शाह ने लोगों से अपनी मातृभाषा और भाषाई विरासत को संरक्षित करने का आग्रह करते हुए कहा, "किसी राष्ट्र की संस्कृति भाषा से ही उत्पन्न होती है और शब्द ही सभ्यता, साहित्य और पहचान की नींव बनाते हैं।"केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, "हमें भारत की समृद्ध भाषाई विविधता को संरक्षित करने की आवश्यकता है और इसलिए लोगों, विशेषकर छात्रों और युवाओं को अपनी मातृभाषा कभी नहीं भूलनी चाहिए क्योंकि यह वह प्राथमिक माध्यम है जिसके द्वारा परंपराएं, मूल्य और संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं।"श्री शाह ने भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत में बंगाल के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि यह राज्य लगभग पांच दशकों से साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक चिंतन में सबसे आगे रहा है और कई क्षेत्रों में देश का नेतृत्व किया है।

उन्होंने कहा कि 'शब्दलोक' जैसे संस्थान भारत की भाषाई परंपराओं को संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों को देश की विविध सांस्कृतिक विरासत की सराहना करने के लिए प्रेरित करने में मदद करेंगे।

श्री अधिकारी ने कहा कि संग्रहालय की स्थापना आर्थिक विकास के साथ-साथ बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए भाषा संरक्षण के पिछले प्रस्ताव को राज्य के पिछले प्रशासन ने लागू नहीं किया था लेकिन मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के दो महीने के भीतर ही इसे स्वीकार कर लिया गया।

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