दरभंगा , अगस्त 27 -- कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत सप्ताह समारोह में गुरूवार को स्नातकोत्तर सभा भवन में शास्त्रचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न शास्त्रों के विशेषज्ञ विद्वानों ने अपने-अपने विषयों पर विचार रखे।सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुरेश्वर झा ने शास्त्रचर्चा के सामयिक प्रयोजन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रवृत्ति, निवृत्ति और नित्यता जैसे मूलभूत लक्षणों से युक्त रचना ही वास्तविक अर्थों में शास्त्र है। शास्त्र मनुष्य को किस कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए और किससे निवृत्त होना चाहिए, इसका विवेक प्रदान करता है।उन्होंने कहा कि शास्त्र की प्रामाणिकता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्राचीन काल में शास्त्रकार-परीक्षा की कठोर व्यवस्था थी। इसी प्रकार काव्य के मानदंड निर्धारित करने के लिए काव्यकार-परीक्षा की भी परंपरा रही है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अध्यक्ष (डीएसडब्ल्यू) प्रो. पुरेन्द्र वारिक ने "स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्" का संदर्भ देते हुए कहा कि आचार्यों ने निरंतर अथक परिश्रम कर समृद्ध शास्त्र परंपरा का निर्माण और संरक्षण किया है। इस परंपरा को अक्षुण्ण रखना वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है।
व्याकरण विभाग की डॉ. साधना शर्मा ने 'अथ शब्दानुशासनम्' विषय पर व्याकरण शास्त्र के स्वरूप, प्रयोजन एवं अध्ययन परंपरा की चर्चा की। साहित्य विभाग की डॉ. निशा ने 'रसास्वादन प्रक्रिया' विषय पर भारतीय काव्यशास्त्र में रसास्वादन की प्रक्रिया एवं विभिन्न रसों की विवेचना की।
ज्योतिष विभाग के डॉ. अवधेश श्रोत्रिय ने 'ग्रहणविमर्शः' विषय पर ग्रहण के खगोलीय एवं धार्मिक पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। दर्शन विभाग के डॉ. छविलाल न्यौपाने ने 'न्याय दर्शन दिशा मोक्षोपायस्वरूपम्' विषय पर न्याय दर्शन के अनुसार अपवर्ग अथवा मोक्ष के साधनों की चर्चा करते हुए दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति को मोक्ष बताया।
धर्मशास्त्र विभाग के प्रो. पुरेन्द्र वारिक ने 'व्यवहारविमर्श' विषय पर वर्तमान संदर्भ में विवाद अथवा मुकदमे के शास्त्रोचित निष्पादन की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। वेद विभाग के डॉ. श्यामसुंदर ठाकुर ने 'अग्निहोत्रस्वरूपम्' विषय पर अग्निहोत्र के वास्तविक स्वरूप और उसकी नित्य-कर्तव्यता की चर्चा करते हुए इसे पर्यावरण शोधन, आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्मसमर्पण से जुड़ा महत्वपूर्ण अनुष्ठान बताया।
शिक्षाशास्त्र विभाग की डॉ. प्रीतिरानी ने 'शिक्षण विधियों का शिक्षा पर प्रभाव' विषय पर विचार रखते हुए कहा कि प्रभावी एवं छात्र-केंद्रित शिक्षण विधियां विद्यार्थियों के सर्वांगीण, मानसिक एवं नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शोधार्थी राजेश कुमार ने 'साहित्य शास्त्र की उपयोगिता' विषय पर विचार प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के सत्र संयोजन की जिम्मेदारी डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र ने निभाई, जबकि मंच संचालन डॉ. यदुवीर स्वरूपशास्त्री ने किया।
इस अवसर पर कुलानुशासक डॉ. कुणाल कुमार झा, व्याकरण-साहित्य संकायाध्यक्ष प्रो. दयानाथ झा, दर्शन संकायाध्यक्ष डॉ. शम्भुशरण तिवारी, दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ. धीरज कुमार पाण्डेय, वेद विभागाध्यक्ष डॉ. द्रुव मिश्र, डॉ. रामनिहोरा राय, संयोजक डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. रामसेवक झा, डॉ. वरुण कुमार झा, डॉ. सविता आर्या सहित शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मी, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी डॉ. निशिकान्त ने बताया कि शास्त्रचर्चा में विभिन्न विभागों के विद्वानों ने क्रमशः अपने विषयों का उपस्थापन किया। उन्होने बतया कि संस्कृत सप्ताह समारोह के दौरान कल स्कूली बच्चों एवं उच्चतर कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग शैक्षिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा।
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