भदोही , जुलाई 05 -- उत्तर प्रदेश में कालीन उद्योग एवं पूर्वांचल के समग्र विकास के लिए लगभग ढाई दशक पहले प्रस्तावित भदोही-वाराणसी विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) (पूर्वा) जैसी अति महत्वाकांक्षी परियोजना शासन प्रशासन की फाइलों में धूल फांक रही है।

वाराणसी-भदोही सेज पूर्वा की परिकल्पना चीन के संघाई में बने विशेष आर्थिक क्षेत्र के तर्ज पर की गई थी। सेज की स्थापना के लिए केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2002 में अधिसूचना जारी की गई थी। विशेष आर्थिक क्षेत्र की नियमावली के अनुरूप एक ही बाउंड्री वॉल के अंदर कालीन बुनाई, धुलाई, क्लिपिंग व फीनिशिंग सहित अन्य सभी प्रकिया पूरी कर सीधे निर्यात करना था।

आधिकारिक सूत्रों की मानें तो सेज नियमावली के अनुसार विशेष आर्थिक क्षेत्र में स्थापित सभी इकाइयों को हर तरह के टैक्स में 10 वर्ष के लिए विशेष छूट का विशेष प्राविधान था। साथ ही सेज बाउंड्री से माल बाहर निकलते समय कमिश्नर स्तर के एक अधिकारी की मुहर लगने के बाद कालीन के पोर्ट तक पहुंचने तक किसी संबंधित विभाग द्वारा जांच पड़ताल अथवा अनाधिकृत हस्तक्षेप के अधिकार स्वयं समाप्त हो जाने की व्यवस्था दी गई थी।

इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए लगभग एक हजार हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण किए जाने की योजना बनाई गई थी। योजना के प्रथम चरण में भदोही-वाराणसी सीमा के कंधिया क्षेत्र के कछुआ बोझ, धानापुर व जोल्हापुर सहित आधा दर्जन गांवों के सैकड़ों किसानों की लगभग 300 एकड़ भूमि चिन्हित कर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई। सेज के लिए भूमि अधिग्रहण व मुआवजा दिए जाने के बावजूद कुछ चुनिंदा किसानों के मामूली विरोध और कानूनी अड़चनों के कारण यह परियोजना लंबे समय से अधर में पड़ी है।

बताया जाता है कि वर्ष 2022-23 में प्रशासन ने परियोजना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, लेकिन किसानों के मामूली विरोध के कारण सेज सृजन का कार्य एकबार फिर अटक गया।

कालीन निर्यात संवर्धन परिषद के उपाध्यक्ष असलम महबूब ने बताया कि भदोही वाराणसी सीमा पर सेज का कार्य पूरा हो जाता तो कारोबार में न सिर्फ चार-चांद लगता, अपितु उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के समग्र विकास का रास्ता भी साफ हो जाता। सेज के अस्तित्व में आने के बाद बेरोजगारी की समस्या का हल निकलने के साथ ही हुनरमंद कारीगरों का पलायन रूकने की समस्या का भी स्थाई समाधान हो सकता था। विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना का मामला खटाई में पड़ने से लाखों बेरोजगार मायूस हैं।

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