नयी दिल्ली , फरवरी 14 -- शराब की लत को सामाजिक कलंक नहीं बल्कि एक गंभीर चिकित्सकीय समस्या के रूप में देखने की आवश्यकता है, यह बात शनिवार को दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) और एल्कोहलिक्स एनीनिमस (एए) के दो दिवसीय सम्मेलन में उठायी गयी।
इस अवसर पर डीएमए के अध्यक्ष डॉ. गिरीश त्यागी ने अपने संबोधन में कहा कि अधिकांश मरीज तब चिकित्सक के पास आते हैं जब शराब की लत शरीर, मन और परिवार को गहरी क्षति पहुंचा चुकी होती है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति अनियंत्रित रूप से शराब पीता है, तो उसका असर केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। पत्नी मानसिक तनाव झेलती है, बच्चे प्रभावित होते हैं और माता-पिता पीड़ा सहते हैं। डॉ. त्यागी ने घोषणा की कि लगभग 18,000 डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व करने वाली डीएमए अपनी 13 शाखाओं के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाएगी।
डीएमए की भावी अध्यक्ष डॉ. नीलम लेखी ने कहा कि शराब की लत का उपचार किसी अन्य दीर्घकालिक बीमारी की तरह गंभीरता से किया जाना चाहिए। यह नैतिक कमजोरी नहीं, बल्कि ऐसी चिकित्सकीय स्थिति है जो मस्तिष्क, व्यवहार और पारिवारिक संरचना को प्रभावित करती है।
सम्मेलन में नशामुक्त जीवन जी रहे 58 वर्षीय एक सदस्य ने अपनी संघर्षपूर्ण यात्रा साझा की। उन्होंने बताया कि वर्षों तक वे शराब की निर्भरता के गहरे अंधेरे में रहे, जहां स्वयं पर नियंत्रण और अन्य उपाय विफल होते चले गए। एए के 12-कदम कार्यक्रम, प्रायोजन और सामुदायिक सहयोग से उन्हें स्थायी नशामुक्ति मिली।
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