नयी दिल्ली , मार्च 02 -- विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, बोस इंस्टीट्यूट और रटगर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक नये अध्ययन की सहायता से जीवाणु जीन विनियमन के प्रचलित मॉडल से अलग हटकर जीवाणु जीन विनियमन और इसके विकास को समझने के लिए नयी प्रकियाओं का पता लगाया है।

इससे संक्रमण तंत्र को अवरुद्ध करने वाले बेहतर एंटीबायोटिक्स या नियामक अवरोधकों की रूपरेखा तैयार करने में सहायता मिल सकती है। यह शोध कुशलतापूर्वक जैव ईंधन, जैव अपघटनीय प्लास्टिक या चिकित्सीय यौगिकों का उत्पादन करने वाले सूक्ष्मजीवों को तैयार करने में मददगार हो सकता है।

लगभग 50 वर्षों से जीवविज्ञान यह बताता आ रहा है कि जीवाणु तथाकथित सिग्मा चक्र" की सहायता से अपने जीन को कैसे सक्रिय करते हैं । ये ऐसे कारक हैं जो आरएनए पॉलीमरेज़ से जुड़कर प्रतिलेखन की शुरुआत करते हैं और फिर अलग होकर जीन के विस्तार की अनुमति देते हैं। यह अवधारणा मुख्य रूप से जीवाणु ई. कोलाई के अवलोकनों पर आधारित है। हालांकि इन शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि यह चक्र एक सार्वभौमिक घटना नहीं है।

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित एक अध्ययन में उन्होंने बताया कि दशकों से चली आ रही वैज्ञानिक मान्यता के विपरीत, बैसिलस सबटिलिस में मुख्य ट्रांसक्रिप्शन शुरू करने वाला फैक्टर सिग्मा ए और एस्चेरिचिया कोलाई कारक का एक संशोधित संस्करण, आरंभिक प्रक्रिया के बाद मुक्त होने के बजाय ट्रांसक्रिप्शन के दौरान आरएनए पॉलीमरेज़ से बंधे रहते हैं।

इस नये शोध ने जीवाणु जीन विनियमन और इसके विकास को समझने के लिये नये रास्ते बताए हैं।

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